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Deepak Dua

Independent Film Journalist & Critic

Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.

A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra

All reviews by Deepak Dua

Image of scene from the film Jaat

Jaat

Action, Drama (Hindi)

‘जाट’ का ठाठ-ढाई किलो का हाथ

Fri, April 11 2025

दक्षिण भारत की यात्रा पर निकला अपना उत्तर भारतीय हीरो वहां के एक ढाबे वाली से पूछता है-अम्मा, दाल-रोटी मिलेगी। जवाब मिलता है-नहीं बेटा, यहां तो इडली है, डोसा है। तो चलो, वही खिला दो। यह फिल्म भी वैसी ही है। हिन्दी में बनी हुई एक साउथ इंडियन फिल्म। यहां तक कि जब पर्दे पर कुछ किरदार किसी दक्षिण भारतीय भाषा में संवाद बोलते हैं तो निर्देशक ने उनके सब-टाइटिल तक नहीं दिए है। भई इडली-डोसा खाइए, रेसिपी मत पूछिए। वैसे भी पिछले कुछ समय से फिल्म वालों ने पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी, हर किस्म की थाली में साउथ इंडियन डिशेज़ परोस-परोस कर हमारी ज़बान का ज़ायका बदल डाला है। सो, जब तक इस ज़ायके की डिमांड है, इडली-डोसा ही परोसा जाएगा। भले ही इडली के संग छोले हों या डोसे के साथ दाल मक्खनी।

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Image of scene from the film Sikandar

Sikandar

Action, Thriller (Hindi)

हिन्दी सिनेमा की कब्र खोदने आया सिकंदर’

Sun, March 30 2025

एक हीरो-दिल का सच्चा, कर्मों का अच्छा, हर किसी की मदद करने वाला, निर्बलों का रखवाला, बड़े दिलवाला। एक विलेन-ताकतवर मंत्री, पैसे वाला, कानून को जेब में रखने वाला, पुलिस को इशारों पर नचाने वाला, गुंडों को पालने वाला। इन दोनों में किसी तरह से दुश्मनी हो जाए तो क्या ज़बर्दस्त एक्शन देखने को मिलेगा न…! वाह-वाह बहुत बढ़िया, लेकिन कैसे कराओगे इनकी दुश्मनी? वह सब आप हम पर छोड़ दीजिए भाई जान, हमारे स्क्रिप्ट राइटर जान लगा देंगे। कहानी में चाहे कोई लॉजिक न डालें, किरदारों में चाहे कोई दम न डालें, फिल्म में एंटरटेनमैंट के नाम पर भले ही फलूदा डालना पड़े, पब्लिक चाहे अपनी छाती के बाल नोच ले लेकिन पर्दे पर होगा तो सिर्फ-तेरा ही जलवा, जलवा, जलवा…! यह हिन्दी सिनेमा का दुर्भाग्य है कि यहां के अधिकांश बड़े सितारे या तो देसी-विदेशी फिल्मों के रीमेक में काम कर रहे हैं या फिर दक्षिण भारतीय निर्देशकों की इडली-डोसा स्टाइल में बनाई ऐसी फिल्मों में जिनमें कथ्य से ज़्यादा ज़ोर स्टाइल पर रहता है। फिल्म वालों ने दशकों पहले जिन बेसिर-पैर की एक्शन फिल्मों की अफीम चटा-चटा कर हिन्दी के दर्शकों की बुद्धि खराब की थी, अब फिर से वही सब परोस कर इन्हें मूर्ख बनाया जा रहा है और अफसोस इस बात पर ज़्यादा किया जाना चाहिए कि आज के दर्शक भी हंसी-खुशी मूर्ख बन रहे हैं। ‘सिकंदर’ (Sikandar) भी यही करने आई है। जाइए, देखिए, बनिए, हमें क्या…!

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Image of scene from the film Rekhachithram

Rekhachithram

Mystery, Thriller (Malayalam)

अद्भुतम ‘रेखाचित्रम’

Mon, March 17 2025

जंगल में एक अधेड़ शख्स वीडियो बना कर खुद को गोली मार लेता है। वीडियो में वह बताता है कि 1985 में उसने अपने दो साथियों के साथ मिल कर इसी जगह पर एक लड़की को गाड़ा था। खुदाई में पुलिस को वहां एक लाश मिलती है। पता चलता है कि यह किसी रेखा नाम की लड़की की लाश है। मारने वालों को भी पुलिस पहचान लेती है। धीरे-धीरे पुलिस को यह भी पता चल जाता है कि रेखा को क्यों मारा गया। लेकिन एक रहस्य अंत तक बना रहता है कि रेखा आखिर थी कौन? कहां से आई थी रेखा? और क्या वह लाश सचमुच रेखा की ही थी? हिन्दी वाले जो अक्सर छाती पीटते हैं न कि उनके पास अच्छी कहानियां नहीं होतीं, उन्हें साऊथ की ऐसी फिल्में देखनी चाहिएं और गौर करना चाहिए कि क्यों साऊथ वाले उनसे कंटेंट के स्तर पर चार कदम आगे खड़े होते हैं। सीखना चाहिए उनसे कि जब कोई थ्रिलर बनाओ तो उसमें थ्रिल पर फोकस करो, सस्पैंस रखो तो ऐसा रखो कि देखने वाला सिर के बाल नोच ले लेकिन उसे क्लू न मिले। यह नहीं कि पुलिस वाले हीरो की डिस्टर्ब लव-लाइफ दिखा दो, हीरो है तो मारधाड़ दिखा दो, बेमतलब का नाच-गाना दिखा दो, पर्दे पर हीरोइन आई नहीं कि उससे कोई ‘ऐसा-वैसा’ सीन करवा लो, जबरन कोई कॉमेडियन घुसेड़ दो। मतलब यह कि जब तक हिन्दी वाले अच्छी-भली कहानी के ऊपर बिना ज़रूरत के मसाले बुरकते रहेंगे, उनकी फिल्मों का रंग भले चोखा निकले, स्वाद बिगड़ा हुआ ही निकलेगा।

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Image of scene from the film Be Happy

Be Happy

Drama, Music (Hindi)

डोन्ट वॉच एंड ‘बी हैप्पी’

Sat, March 15 2025

धारा नाम की एक बच्ची ऊटी में अपने पापा और नाना के साथ रहती है। कमाल का डांस करती है सो ‘इंडियाज़ सुपरस्टार डांसर’ नामक शो में भाग लेने के लिए मुंबई जाना चाहती है। पापा मना करते हैं तो डांस-टीचर उन्हें समझाती है कि पेरेंट्स दो तरह के होते हैं-एक वो जिनके बच्चे उनके ड्रीम्स जीते हैं और दूसरे वो जो अपने बच्चों के ड्रीम्स जीते हैं। बात पापा को लग जाती है और ये लोग पहुंच जाते हैं मुंबई। लेकिन यहां कुछ ऐसा होता है कि सारे ड्रीम्स एक तरफ हो जाते हैं। तब पापा कहता है कि मैंने धारा को कभी गिरने नहीं दिया है, आज भी गिरने नहीं दूंगा। कहानी बढ़िया है। एक बच्ची, उसका ड्रीम, कभी आड़े आया पिता जो आज उसके साथ है। यह धुकधुकी कि अब उसका सपना सच होगा या नहीं…! लेकिन यह कहानी एक पैराग्राफ में ही बढ़िया लगती है क्योंकि फिल्म कहानी पर नहीं, उस पर फैलाई गई स्क्रिप्ट पर बनती है और इस फिल्म की स्क्रिप्ट न सिर्फ ढीली व कमज़ोर है बल्कि इसमें से वह भावनाओं और संवेदनाओं की खुशबू भी लापता है जो इस किस्म की फिल्मों की जान होती है। वह खुशबू, जो दर्शकों के नथुनों से भीतर जाकर उसके ज़ेहन में जगह बनाती है, उसे उद्वेलित करती है और अंत में भावुक करते हुए उसे भिगो जाती है। इस फिल्म में यह खुशबू बस कहने भर को है जो एक-आध दफा महसूस होती है और फिर हवा हो जाती है।

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Image of scene from the film The Diplomat

The Diplomat

Thriller, Drama (Hindi)

अच्छी है, सच्ची है

Sat, March 15 2025

मई, 2017 की बात है। एक पाकिस्तानी जोड़ा भारत का वीज़ा लेने के लिए पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास पहुंचा। काउंटर पर पहुंच कर उस लड़की उज़्मा अहमद ने कहा कि मैं भारतीय हूं और यहां फंस गई हूं, कृपया मेरी मदद कीजिए। भारतीय डिप्लोमेट जे.पी. सिंह ने मामले की नज़ाकत को समझते हुए उस लड़की को दूतावास में शरण दी। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान की धरती पर एक पेचीदा कानूनी लड़ाई लड़ने और उसमें जीतने के बाद उस लड़की को वापस भारत लाने में कामयाबी पाई। इस लड़ाई में भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री (स्वर्गीय) सुषमा स्वराज की महती भूमिका रही जिन्होंने न सिर्फ उस लड़की को बेफिक्र किया बल्कि राजनयिक जे.पी. सिंह की पीठ भी थपथपाई। यह फिल्म ‘द डिप्लोमेट’ (The Diplomat) उसी कहानी को दिखाती है, बहुत सारी विश्वसनीयता के साथ, थोड़े फिल्मीपने के साथ। किसी सच्ची घटना पर फिल्में अपने यहां हमेशा से बनती आई हैं। हाल के बरसों में यह रफ्तार थोड़ी तेज़ हुई है तो उसकी प्रमुख वजह यह है कि दर्शकों में ऐसी कहानियों को देखने व सराहने के प्रति जागरूकता बढ़ी है। ऐसे में यदि फिल्म वाले चुन-चुन कर ऐसी कहानियां सामने ला रहे हैं जो सच की कोख से निकली हैं और दर्शकों को छू पा रही हैं तो उनकी सराहना होनी चाहिए। खासतौर से तब, जब उन कहानियों को परोसा भी सलीके से गया हो। यह फिल्म यही करती है।

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Image of scene from the film Bada Naam Karenge

Bada Naam Karenge

Drama, Family (Hindi)

दिल के छज्जे पे चढ़ेंगे, ‘बड़ा नाम करेंगे’

Thu, March 6 2025

सोनी लिव पर आई नौ एपिसोड की इस वेब-सीरिज़ के पांचवें एपिसोड के अंत में जब नायक ऋषभ नायिक सुरभि से कहता है-‘मुझ से शादी कर लो प्लीज़’ तो उसकी आंखें नम होती हैं। यह सुनते हुए सुरभि की भी आंखें नम होती हैं। इस सीन को यहीं पॉज़ कर दीजिएगा और गौर कीजिएगा कि एक हल्की-सी नमी आपकी आंखों में भी होगी। अब याद कीजिएगा कि आपकी आंखें इससे पहले के एपिसोड्स में भी कुछ जगह पनियाई होंगी और ध्यान रखिएगा, अभी आगे भी आपकी आंखों में कई बार नमी आएगी। बल्कि कुछ एक बार तो यह नमी झरने का रूप भी लेना चाहेगी। जी हां, यह इस कहानी की ताकत है, उस सिनेमा की ताकत है जो ऐसी कहानी को आपके सामने इस तरह से लाता है कि आप, आप नहीं रहते बल्कि इस कहानी के किरदार हो जाते हैं, कभी मुंबई, कभी उज्जैन तो कभी रतलाम हो जाते हैं।

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Image of scene from the film Crazxy

Crazxy

Thriller (Hindi)

‘क्रेज़ी’ किया रे…

Fri, February 28 2025

पहले ‘शिप ऑफ थीसियस’, फिर ‘तुम्बाड़’ और अब यह फिल्म ‘क्रेज़ी’-इतना तो साफ है कि बतौर निर्माता सोहम शाह जो कर रहे हैं उसे एक शब्द में कहा जाए तो वह होगा-दुस्साहस। जब बनाने वाले को दो और दो मिला कर पांच न करने हों, जब उसे टिकट-खिड़की के आंकड़ों की परवाह न हो तो ही वह कुछ हट के वाला सिनेमा बना पाता है। ‘क्रेज़ी’ (Crazxy) इस का ताज़ा उदाहरण है। किसी को पांच करोड़ रुपए देने जा रहे डॉक्टर अभिमन्यु सूद को फोन आता है कि उसकी बेटी किडनैप कर ली गई है और फिरौती की रकम है-पूरे पांच करोड़। वही बेटी जिसे अभिमन्यु ने कभी जी भर कर निहारा तो दूर, स्वीकारा तक नहीं। वही बेटी जो अभिमन्यु की तलाकशुदा पत्नी के पास रहती है। इधर अभिमन्यु की ज़िंदगी दांव पर है। उधर उसकी तलाकशुदा पत्नी अपनी बेटी को बचाने के लिए मिन्नतें कर रही है। वहीं उसकी प्रेमिका उसे इस झमेले से दूर रहने को उकसा रही है। लेकिन इस चक्रव्यूह में फंस चुका अभिमन्यु तय करता है कि वह अब भेजे की नहीं सुनेगा क्योंकि भेजे की सुनेगा तो…!

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Image of scene from the film Superboys of Malegaon

Superboys of Malegaon

Comedy, Drama (Hindi)

गहरे नहीं उतर पाते ‘सुपरबॉयज़ ऑफ मालेगांव’

Wed, February 26 2025

सिनेमा से राब्ता रखने वालों को तो मालेगांव और वहां की सिनेमाई हलचलों के बारे में पता होगा। जिन्हें नहीं पता, वे पहले यह जान लें कि मालेगांव दरअसल महाराष्ट्र के नासिक जिले का एक छोटा-सा मुस्लिम बहुल शहर है। 90 के दशक में यहां के एक उत्साही युवक नासिर शेख ने अपने दोस्तों, साथियों के साथ मिल कर बहुत कम पैसों में ‘मालेगांव के शोले’, ‘मालेगांव का चिंटू’ सरीखी फिल्में बना कर खूब वाहवाही बटोरी थी और अपनी एक स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री खड़ी कर डाली थी। उनके बारे में 2012 में आई फैज़ा अहमद खान की एक डॉक्यूमैंट्री ‘सुपरमैन ऑफ मालेगांव’ बहुत सराही गई थी। उसी डॉक्यूमैंट्री और मालेगांव के उन नौजवानों की ज़िंदगी पर डायरेक्टर रीमा कागती यह फिल्म ‘सुपरबॉयज़ ऑफ मालेगांव’ लेकर आई हैं। ‘सुपरबॉयज़ ऑफ मालेगांव’ कुछ ऐसे नौजवानों की ज़िंदगी दिखाती है जो फोटो स्टूडियो, दुकानदारी, कपड़े की मिल आदि में काम करते हुए रुटीन ज़िंदगी जी रहे हैं लेकिन कुछ अलग, कुछ बड़ा करने की चाहत इन्हें फिल्म-निर्माण की तरफ ले जाती है। कामयाबी मिलने के बाद रिश्तों में दूरियां आती हैं तो मुश्किल वक्त इन्हें फिर से करीब भी ले आता है।

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