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Deepak Dua

Independent Film Journalist & Critic

Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.

A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra

All reviews by Deepak Dua

Image of scene from the film Thug Life

Thug Life

Action, Crime, Drama (Tamil)

भव्यता से ठगती है ‘ठग लाइफ’

Fri, June 6 2025

पुलिस और गुंडों की गोलीबारी में एक शरीफ आदमी मारा गया। उसके बेटे को एक गैंग्सटर ने पाला-पोसा। गैंग्सटर जब जेल जाने लगा तो उस बच्चे को अपना वारिस बना गया। गैंग्सटर के बड़े भाई को बुरा लगा तो उसने उस बच्चे के कान भरने शुरू कर दिए। एक दिन उस गैंग्स्टर के अपने ही उसके खिलाफ हो गए। लेकिन उस गैंग्स्टर की यमराज से दोस्ती है। वह लौटा और उसने सबका बदला लिया। ऊपर बताए गए कहानी के ढांचे में पांच मुख्य बिंदु हैं-1-शरीफ आदमी की मौत, जिसके बच्चे को गैंग्स्टर ने पाला, 2-गैंग्स्टर का जेल जाना, 3-उस बच्चे को वारिस बनाना, जिससे भाई जल-भुन गया 4-उसके अपनों का उस पर हमला और 5-उसका लौट कर बदला लेना। इस फिल्म को देखिए तो इन सभी बिंदुओं की बुनियाद इस कदर कमज़ोर दिखाई देती है कि हैरानी होती है कि इस फिल्म को लिखने वालों में खुद कमल हासन और मणिरत्नम भी हैं। ज़रा-सा भी दिमाग लगाते ही इस फिल्म की लिखाई की सिलाई उधड़ने लगती है। 1-उस शरीफ आदमी का मारा जाना अचानक से ठूंसा गया लगता है, अखबार बच्चे बांट रहे थे और गोली बेवजह चली, 2-गैंग्सटर जिस अपराध के लिए जेल जा रहा था, वह साबित कैसे हुआ होगा? 3-जेल जाते समय उसने भाई की बजाय उस बच्चे को ही वारिस क्यों चुना, फिल्म नहीं दिखा पाती, 4-जहां पर गैंग्स्टर के अपनों ने उस पर हमला किया, वहां जाने का प्लान जबरन घुसेड़ा गया लगता है और 5-अंत में गैंग्स्टर उस बच्चे को एक बात बताने जाता है लेकिन बताने की बजाय वह उसे मारे ही जा रहा है, मारे ही जा रहा है, आखिर क्यों?

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Image of scene from the film Stolen

Stolen

Drama, Thriller (Hindi)

चैन चुराती है मगर…

Wed, June 4 2025

राजस्थान के किसी छोटे-से रेलवे-स्टेशन से एक बच्चा चोरी हो जाता है। शक जाता है उसी समय ट्रेन से उतरे एक युवक और उसे लेने आए उसके भाई पर। इससे पहले कि मामला ठंडा हो, इनका एक वीडियो वायरल हो जाता है और कई लोग इनकी जान के दुश्मन बन जाते हैं। अब शुरू होती है एक ऐसी भागमभाग भरी अंधेरी रात जिसकी सुबह नज़र नहीं आती। उधर वह बच्चा किस का था, कौन ले गया, कहां ले गया जैसे तमाम सवाल भी अभी अनसुलझे ही हैं। 2023 में बनी और कई फिल्म फेस्टिवल्स में घूम कर आई इस फिल्म की लिखावट और बुनावट कसी हुई-सी लगती है। कुछ घंटों की कहानी में गिनती के कुछ किरदारों की भागमभाग और उनके पीछे हाथ धो कर पड़े लोगों की कहानियां अपनी इसी कसावट के चलते ही भाती हैं। अनुष्का शर्मा वाली ‘एन एच 10’ इस कतार में सबसे पहले याद आती है। नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी, भूमि पेडनेकर वाली ‘अफवाह’ और तारा सुतारिया वाली ‘अपूर्वा’ भी ऐसी ही कहानियां दिखा रही थीं। ‘स्टोलन’ इन तीनों का मिक्सचर लगती है। ‘एन एच 10’ की तरह इसके किरदार गलत वक्त पर गलत जगह होने के कारण मुसीबतों में फंसते चले जाते हैं। ‘अपूर्वा’ और ‘स्टोलन’ में भौगोलिक स्थितियां एक जैसी हैं और दोनों में अभिषेक बैनर्जी की मौजूदगी इन्हें करीब लाती है। वहीं ‘अफवाह’ की तरह वायरल वीडियो और पीछे पड़े लोगों का हुजूम ‘स्टोलन’ को भी एक डरावनी फिल्म बनाता है। इसे देखते हुए यह सोच कर मन बेचैन होने लगता है कि ऐसे हालात में अपन कभी फंस गए तो…!

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Image of scene from the film Chidiya

Chidiya

Adventure, Drama, Family (Hindi)

सपनों के घोंसले में ख्वाहिशों की ‘चिड़िया’

Fri, May 30 2025

इस फिल्म का नाम, पोस्टर और ट्रेलर देखिए तो लगता है कि यह ऐसे गरीब बच्चों की कहानी होगी जो बैडमिंटन खेलना चाहते हैं लेकिन उनके पास न जगह है, न संसाधन। किसी तरह से ये लोग सब जुगाड़ते हैं, मुश्किलों से लड़ते हैं और एक दिन अपने से बलशाली खिलाड़ियों को हरा कर जीत हासिल करते हैं। लेकिन यह फिल्म देखिए तो ऐसा कुछ नहीं मिलता। बिन बाप के दो बच्चे हैं। ‘चिड़िया’ से खेलना चाहते हैं। किसी तरह से जगह, सामान वगैरह का इंतज़ाम करते हैं लेकिन मां का हाथ बंटाने के लिए उन्हें काम पर जाना पड़ता है। बैडमिंटन खेलने का उनका सपना अंत तक सपना ही बना रहता है। और फिर एक दिन…! यह कहानी असल में उन लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन में झांकती है जो अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पूरी ज़िंदगी निकाल देते है। इस दौरान कभी उनके छोटे-छोटे सपने, छोटी-छोटी ख्वाहिशें सिर उठाती भी हैं तो अक्सर उन्हें दबा दिया जाता है। इस फिल्म को देखिए तो अफसोस होता है कि जिस उम्र में बच्चे पढ़ते हैं, खेलते हैं उस उम्र में कुछ बच्चों को मज़दूरी क्यों करनी पड़ती है? इन बच्चों की बाल-सुलभ हरकतें, जिज्ञासाएं, तमन्नाएं हैं लेकिन मन में टीस उठती है उनकी गरीबी, मजबूरी, बेबसी को देख कर। यह फिल्म हमें ऐसे किरदारों के करीब ले जाकर यह भी दिखाती है कि सपने देखने का हक सिर्फ भरी जेब वालों को ही नहीं होता।

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Image of scene from the film Dilli Dark

Dilli Dark

Drama (Hindi)

दिल्ली की जुदा सूरत दिखाती ‘दिल्ली डार्क’

Thu, May 29 2025

‘यह अंधेर नगरी है, यहां गलत रास्ता ही मेन रोड है।’ इस फिल्म (Dilli Dark) का एक पगला किरदार दिल्ली के बारे में जब यह बात कहता है तो लगता है कि इस शहर के बारे में इससे ज़्यादा सयानी बात भला और क्या हो सकती है। दिल्ली-नक्शे पर एक शहर लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसी जगह जो जितनी बार उजड़ी, अगली बार उससे ज़्यादा शिद्दत के साथ बसी। एक ऐसी जगह जहां कभी पांडवों ने राज किया तो कभी बाहरी आक्रमणकारी जाते-जाते अपने गुलामों को गद्दी सौंप गए। वही गुलाम वंश जिसमें रज़िया जैसी सुलतान हुई और वही रज़िया जिसने अफ्रीका से आए अपने गुलाम याक़ूत से मोहब्बत की। आज बरसों बाद एक और अफ्रीकी युवक दिल्ली में रह रहा है। माइकल ओकेके (ओके ओके नहीं ओकेके) एक आम लड़का है जिसे हिन्दी समझ में आती है और वह ‘तोड़ा-तोड़ा’ बोल भी लेता है। वह दिल्ली वाला है, दिल्ली वाला बन कर यहीं रहना भी चाहता है। दिन में एम.बी.ए. करता है, लेकिन रात में मजबूरन उसे ड्रग्स बेचनी पड़ती हैं। पंजाबी मकान मालिक की लड़की को देखता है, पड़ोसी बंगाली से दोस्ती करता है, एक धर्मगुरु मानसी उर्फ ‘मां’ के नज़दीक पहुंचता है लेकिन पाता है कि इस शहर में हर कोई बस अपने लिए जीता है।

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Image of scene from the film American Manhunt - Osama bin Laden

American Manhunt - Osama bin Laden

Documentary (English)

देखिए ओसामा बिन लादेन को पकड़ने की कवायद

Sun, May 25 2025

नेटफ्लिक्स पर ‘अमेरिकन मैनहंट’ के तहत ऐसी कई डॉक्यूमैंट्री हैं जिनमें अमेरिका द्वारा समय-समय पर किए गए ‘मैनहंट’ यानी किसी अपराधी, आतंकवादी, कातिल की तलाश से जुड़ी जानकारी साझा की गई है। उसी कतार में ‘अमेरिकन मैनहंट-ओसामा बिन लादेन’ नाम की यह तीन एपिसोड की डॉक्यूमैंट्री आई है जो बताती है कि अमेरिका के इतिहास में 11 सितंबर, 2001 को उस पर हुए सबसे घातक हमले से पहले भी अमेरिका ओसामा को पकड़ना चाहता था लेकिन इस हमले के बाद तो जैसे अमेरिकी खुफिया विभाग रात-दिन उसके पीछे लगा रहा और आखिर दस साल लंबे इंतज़ार और कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने उसे एक रात पाकिस्तान के एबटाबाद में उसके घर में मार गिराया और उसकी लाश को समुंदर की गहराइयों में फेंक दिया ताकि कल को कोई उसका मकबरा बना कर वहां सजदा न करने लगे। बड़े विस्तार से यह डॉक्यूमैंट्री अमेरिकी खुफिया विभाग के लोगों, सैन्य अफसरों व उन लोगों से मिलवाती है जिन्होंने फूंक-फूंक कर कदम रखते हुए दस साल लंबा समय लगा कर यह पाया कि ओसामा कहां है, उसे कैसे घेरा और गिराया जाएगा।

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Image of scene from the film Bhool Chuk Maaf

Bhool Chuk Maaf

Comedy, Romance, Science Fiction (Hindi)

लप्पूझन्ना फिल्म है ‘भूल चूक माफ’

Fri, May 23 2025

फिल्म के पहले सीन में लड़का-लड़की घर छोड़ कर भाग रहे हैं। लड़का 25 की उम्र में ‘कुछ नहीं’ करता है। बाद में पता चलता है कि ‘कुछ नहीं’ करना उसका खानदानी काम है क्योंकि उसके पिता भी ‘कुछ नहीं’ करते हैं और उसका एक मामा भी अपनी बहन के घर में ‘कुछ नहीं’ करता है। यानी यह लड़का दिमाग से पैदल यानी डंब है क्योंकि लड़की को वह कहां ले जाएगा, कैसे रखेगा, यह उसे नहीं पता। अचानक से लड़की को ख्याल आता है कि उसके यूं भागने से कहीं उसके पिता खुदकुशी न कर लें सो वह गाड़ी घुमाने को कहती है। यानी यह ‘पापा की परी’ भी दिमाग से डंब है। एक डंब लड़की ही किसी 25 साल के बेरोज़गार लड़के के साथ शादी करने के इरादे से घर से भाग सकती है। एक बात और-इन दोनों डंब लोगों में प्यार कैसे हुआ और क्यों टिका हुआ है, यह पूरी फिल्म में न तो बताया गया, न दिखाया गया और न ही महसूस करवाया गया। खैर, थोड़ी ही देर में हमें पता चलता है कि इन दोनों के घरवाले भी इनकी तरह डंब हैं क्योंकि लड़की का बाप ‘एक महीने में सरकारी नौकरी ले आओ, मेरी लड़की ले जाओ’ जैसी डंब शर्त रखता है जिसे उसकी डंब लड़की बढ़वा कर दो महीने करवा देती है। मोहलत का वक्त निकलने के बाद जिस लड़के से वह अपनी लड़की का विवाह करवाने को तैयार होता है, उसकी डंब हरकतें देख कर लगता है कि यह बाप है या लप्पूझन्ना…!

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Image of scene from the film Mission: Impossible - The Final Reckoning

Mission: Impossible - The Final Reckoning

Action, Adventure, Thriller (English)

दुनिया के वजूद को बचाने का आखिरी ‘मिशन इम्पॉसिबल’

Mon, May 19 2025

ज़रा सोचिए कि जिस ए.आई. यानी आर्टिफिशल इंटेलीजेंस (कृत्रिम बुद्धिमता) को इंसान ने अपनी मदद के लिए बनाया उस ए.आई. की ही नीयत खराब हो जाए और वह इंसानों को अपने इशारों पर नचाने लगे तो…? 2023 में आई ‘मिशन इम्पॉसिबल’ सीरिज़ की 7वीं फिल्म में आई.एम.एफ. यानी इम्पॉसिबल मिशन फोर्स के जाबांज़ एजेंट ईथन हंट ने ए.आई. को काबू में करने वाली चाबी हासिल कर ली थी जो पता नहीं कहां लगेगी। अब इस कड़ी की 8वीं और आखिरी फिल्म ‘मिशन इम्पॉसिबल-द फाइनल रेकनिंग’ में ए.आई., जिसे ‘एन्टिटी’ या ‘वजूद’ कहा गया है, धीरे-धीरे दुनिया के परमाणु शक्तिसंपन्न देशों पर कब्जा कर रहा है। ऐसे नौ देशों पर कब्जा होते ही वह दुनिया को तबाह कर देगा। उसे रोकने का एक ही तरीका है कि समुद्र की गहराइयों में दफन एक पनडुब्बी में वह चाबी लगा कर एक ड्राइव हासिल की जाए। विलेन गैब्रियल चाहता है कि ईथन उसे वह ड्राइव लाकर दे ताकि वह ‘वजूद’ पर अधिकार कर सके। इस बीच ईथन के साथी लूथर ने एक वायरस बनाया है जिसे लगाते ही ‘वजूद’ निष्क्रिय हो जाएगा लेकिन गैब्रियल उसे ले जाता है। अब ईथन और उसकी टीम को पहले पनडुब्बी का पता लगाना है, उसमें से ड्राइव लेनी है, गैब्रियल से वह वायरस लेना है, उसे ‘वजूद’ में लगाना है, सारा डाटा उसमें लेना है और सैकिंड के सौवें हिस्से में उसे निकालना है। इस सारे काम के लिए इनके सिर्फ पास तीन-चार दिन हैं नहीं तो सब तबाह हो जाएगा।

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Image of scene from the film Naale Rajaa Koli Majaa

Naale Rajaa Koli Majaa

Drama, Comedy, Family (Kannada)

चिकन करी का मज़ा ‘नाले रजा कोली मजा’

Sun, May 11 2025

2021 में अपनी कन्नड़ फिल्म ‘कोली ताल’ (चिकन करी) लाकर तारीफें पाने वाले फिल्मकार अभिलाष शैट्टी अब उसी कतार में ‘नाले रजा कोली मजा’ (संडे स्पेशल) नाम की यह फिल्म लेकर आए हैं। स्नेहा के घर में हर संडे को चिकन बनता है। पूरे हफ्ते उसे इस दिन का इंतज़ार रहता है। लेकिन इस संडे को है गांधी जयंती और इस दिन चिकन की दुकानें बंद रहती हैं। अब स्नेहा को तो चिकन खाना ही खाना है। अब शुरू होती है चिकन की तलाश जो उसे एक दिलचस्प सफर पर ले जाती है। महज़ दो दिन की इस छोटी-सी कहानी को लेखक-निर्देशक अभिलाष ने रोचकता से फैलाया है और अंत में सार्थकता से समेटा भी है। बतौर लेखक वह यह संदेश दे पाने में सफल रहे हैं कि इंसान की खाने-पीने की अपनी-अपनी चॉयस होती है और किसी दूसरे को इस आधार पर उसे जज करने का कोई अधिकार नहीं है। अभिलाष के निर्देशन में परिपक्वता है और पूरी फिल्म में वह कसावट बनाए रखते हैं। यह फिल्म मनोरंजक है, दिलचस्प है और प्यारी भी।

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