
Deepak Dua
Independent Film Journalist & Critic
Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.
A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra
All reviews by Deepak Dua

Panchayat S04
Comedy, Drama (Hindi)
रंगीले परजातंतर की रंग-बिरंगी ‘पंचायत’
Tue, June 24 2025
अमेज़न प्राइम वीडियो की सफल और लोकप्रिय वेब-सीरिज़ ‘पंचायत’ के तीसरे सीज़न में फुलेरा गांव में राजनीतिक सरगर्मियां शुरू हो गई थीं और माहौल बदलने लगा था। प्रधान जी पर गोली चली थी, रिंकी और सचिव जी की नज़दीकियां बढ़ चुकी थीं और भूषण व क्रांति देवी ने प्रधान व मंजू देवी के विरुद्ध कमर कस ली थी। ऐसे में यह तो साफ था कि इस चौथे सीज़न का फोकस राजनीति पर ही रहेगा लेकिन इस फोकस के चलते ‘पंचायत’ अपना मूल स्वाद खो बैठेगी, यह अंदेशा नहीं था। लेकिन ऐसा हुआ है और यही कारण है कि ‘पंचायत’ का यह चौथा सीज़न अच्छा तो लगता है, मगर इसे देखते हुए वह ‘मज़ा’ नहीं आता जिस ‘मज़े’ के लिए यह वेब-सीरिज़ जानी जाती है और जिसके चलते इसने हमारे दिलों पर कब्जा जमाया था। ‘पंचायत’ के पिछले तीनों सीज़न के रिव्यू में मैंने ज़िक्र किया है कि इसे लिखने वाले हर चीज़ को खींचने में लगे हुए हैं जिससे साफ लगता है कि वे लोग कई सारे सीज़न बनाने का लालच अपनी मुट्ठी में लिए बैठे हैं। बावजूद इसके यह सीरिज़ हमें पसंद आती रही है क्योंकि एक तो यह हमें ओ.टी.टी. पर मौजूद अधिकांश कहानियों से परे एक छोटे-से गांव में ले जाती है जहां की मिट्टी में अभी भी सौंधापन बचा हुआ है और दूसरे यह इस उम्मीद को कायम रखती है कि अभी सब कुछ उतना खराब नहीं हुआ है। लेकिन ‘पंचायत’ का चौथा सीज़न देखिए तो लगता है कि इसे बनाने वाले कहानी को जबरन खींच-खींच कर सुस्त रफ्तार से कहानी कहने का कोई विश्व रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं। इस बार के आठों एपिसोड में सिर्फ चुनावों की ही बात है जिससे इसमें एकरसता आई है और कुछ बहुत नया या हट के वाली सामग्री न होने के कारण बोरियत हावी रही है।

Sitaare Zameen Par
Comedy, Drama (Hindi)
मन में उजाला करते ‘सितारे ज़मीन पर’
Fri, June 20 2025
बॉस्केट बॉल टीम का फ्रस्टेटिड जूनियर कोच शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए पुलिस की गाड़ी को ठोक देता है। अदालत उसे सज़ा सुनाती है कि वह बौद्धिक रूप से अक्षम लोगों की एक बॉस्केट बॉल टीम को तीन महीने तक प्रशिक्षित करेगा। कोच भरी अदालत में पूछ बैठता है-तीन महीने तक पागलों को सिखाऊंगा मैं…? सिखाने जाता है तो वह पूछता है-मैं टीम कैसे बनाऊं, टीम तो नॉर्मल लोगों की बनती है न…? इतनी कहानी तो आपको इस फिल्म का ट्रेलर भी बता देता है। ट्रेलर तो यह भी बताता है कि इन ‘पागलों’ को कोचिंग देते हुए यह कोच अपने बाल नोच रहा है। लेकिन ट्रेलर से आगे बढ़ कर यह फिल्म दिखाती है कि ज़माना जिन्हें ‘नॉर्मल’ तक नहीं मानता वे लोग न सिर्फ हमसे कहीं ज़्यादा नॉर्मल हैं बल्कि कुछ मायने में तो बेहतर भी हैं। फिल्म यह भी बताती है कि हर किसी का अपना-अपना नॉर्मल होता है, हमें उसे पहचानने और स्वीकारने को राज़ी होना चाहिए।

Detective Sherdil
Comedy, Mystery (Hindi)
खोदा पहाड़ निकला ‘डिटेक्टिव शेरदिल’
Fri, June 20 2025
कुछ फिल्में देखने के बाद ही नहीं बल्कि देखते समय ही मन के एक कोने में ये सवाल उठने लगते हैं कि आखिर इन्हें बनाने की प्रक्रिया क्या रही होगी? कैसे इस कहानी पर किसी निर्माता को राज़ी किया गया होगा? इसके लिए पैसे कहां से जुटाए गए होंगे? बड़े कलाकारों को कैसे राज़ी किया गया होगा? इसकी शूटिंग के लिए जगह कैसे तय की गई होगी? किस तरह से एक नामी ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म को यह फिल्म दी गई होगी? वगैरह-वगैरह…! और फिर मन के दूसरे कोने से आवाज़ आती है-अरे भोले, लगता है तू भूल गया कि बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा…!!! बुल्गारिया (यह यूरोप का एक देश है) में रह रहे एक अमीर भारतीय बिज़नैसमैन का कत्ल हो जाता है। शक सीधे उसके परिवार वालों पर जाता है। ज़ाहिर है कि वह अपनी दौलत के चलते मारा गया। बुल्गारिया की पुलिस के तीन भारतीय अफसर इस केस को सुलझाने में लगे हैं। किस ने किया होगा यह कत्ल? क्यों किया होगा? क्या घर का ही कोई आदमी है या फिर…?

Housefull 5
Comedy, Crime, Mystery (Hindi)
चैनसुख और नैनसुख देती ‘हाउसफुल 5’
Fri, June 6 2025
2010 में आई सबसे पहली ‘हाउसफुल’ का रिव्यू ‘फिल्मी कलियां’ मैगज़ीन में करने के बाद मैंने इस सीरिज़ की अगली फिल्मों यानी ‘हाउसफुल 2’, ‘हाउसफुल 3’ और ‘हाउसफुल 4’ का रिव्यू नहीं किया था। दरअसल इस सीरिज़ की फिल्में जिस किस्म की मैड कॉमेडी परोसती हैं, उन्हें रिव्यू की ज़रूरत भी नहीं होती। लेकिन कॉमेडी के नाम पर रायता फैलाते-फैलाते ‘हाउसफुल 4’ ने जब कॉमेडी का कचरा किया तो मुझे लगा कि इस 5वीं वाली का रिव्यू किया जाए-इसलिए भी कि पहली बार ऐसा हुआ है जब कोई हिन्दी फिल्म ‘हाउसफुल 5ए’ और ‘हाउसफुल 5बी’ के नाम से रिलीज़ हुई है। बता दूं कि मैंने दोनों फिल्में देखीं। दोनों एक ही हैं, बस अंत के 20 मिनट में यह बदलाव किया गया है कि दोनों में कातिल अलग-अलग हैं। अरबों की दौलत का मालिक रणजीत डोबरियाल एक क्रूज़ पर अपना सौवां जन्मदिन मनाने जा रहा है। अचानक आई मौत से पहले वह वसीयत कर जाता है कि उसकी दौलत का वारिस उसका बेटा जॉली होगा। अचरज तब होता है जब शिप पर तीन-तीन जॉली अपनी-अपनी पत्नियों के साथ पहुंच जाते हैं। कौन है इनमें से असली वाला जॉली? कोई है भी या…! तभी शिप पर एक कत्ल होता है और शक इन तीनों जॉलियों और उनकी बीवियों पर आता है जिसकी जांच करने दो पुलिस वाले और उनका एक गुरु शिप पर पहुंचते हैं। वैसे शक के दायरे में शिप के स्टाफ के भी कुछ लोग हैं। किसने किया होगा यह कत्ल? और आखिर क्यों…!

Thug Life
Action, Crime, Drama (Tamil)
भव्यता से ठगती है ‘ठग लाइफ’
Fri, June 6 2025
पुलिस और गुंडों की गोलीबारी में एक शरीफ आदमी मारा गया। उसके बेटे को एक गैंग्सटर ने पाला-पोसा। गैंग्सटर जब जेल जाने लगा तो उस बच्चे को अपना वारिस बना गया। गैंग्सटर के बड़े भाई को बुरा लगा तो उसने उस बच्चे के कान भरने शुरू कर दिए। एक दिन उस गैंग्स्टर के अपने ही उसके खिलाफ हो गए। लेकिन उस गैंग्स्टर की यमराज से दोस्ती है। वह लौटा और उसने सबका बदला लिया। ऊपर बताए गए कहानी के ढांचे में पांच मुख्य बिंदु हैं-1-शरीफ आदमी की मौत, जिसके बच्चे को गैंग्स्टर ने पाला, 2-गैंग्स्टर का जेल जाना, 3-उस बच्चे को वारिस बनाना, जिससे भाई जल-भुन गया 4-उसके अपनों का उस पर हमला और 5-उसका लौट कर बदला लेना। इस फिल्म को देखिए तो इन सभी बिंदुओं की बुनियाद इस कदर कमज़ोर दिखाई देती है कि हैरानी होती है कि इस फिल्म को लिखने वालों में खुद कमल हासन और मणिरत्नम भी हैं। ज़रा-सा भी दिमाग लगाते ही इस फिल्म की लिखाई की सिलाई उधड़ने लगती है। 1-उस शरीफ आदमी का मारा जाना अचानक से ठूंसा गया लगता है, अखबार बच्चे बांट रहे थे और गोली बेवजह चली, 2-गैंग्सटर जिस अपराध के लिए जेल जा रहा था, वह साबित कैसे हुआ होगा? 3-जेल जाते समय उसने भाई की बजाय उस बच्चे को ही वारिस क्यों चुना, फिल्म नहीं दिखा पाती, 4-जहां पर गैंग्स्टर के अपनों ने उस पर हमला किया, वहां जाने का प्लान जबरन घुसेड़ा गया लगता है और 5-अंत में गैंग्स्टर उस बच्चे को एक बात बताने जाता है लेकिन बताने की बजाय वह उसे मारे ही जा रहा है, मारे ही जा रहा है, आखिर क्यों?

Stolen
Drama, Thriller (Hindi)
चैन चुराती है मगर…
Wed, June 4 2025
राजस्थान के किसी छोटे-से रेलवे-स्टेशन से एक बच्चा चोरी हो जाता है। शक जाता है उसी समय ट्रेन से उतरे एक युवक और उसे लेने आए उसके भाई पर। इससे पहले कि मामला ठंडा हो, इनका एक वीडियो वायरल हो जाता है और कई लोग इनकी जान के दुश्मन बन जाते हैं। अब शुरू होती है एक ऐसी भागमभाग भरी अंधेरी रात जिसकी सुबह नज़र नहीं आती। उधर वह बच्चा किस का था, कौन ले गया, कहां ले गया जैसे तमाम सवाल भी अभी अनसुलझे ही हैं। 2023 में बनी और कई फिल्म फेस्टिवल्स में घूम कर आई इस फिल्म की लिखावट और बुनावट कसी हुई-सी लगती है। कुछ घंटों की कहानी में गिनती के कुछ किरदारों की भागमभाग और उनके पीछे हाथ धो कर पड़े लोगों की कहानियां अपनी इसी कसावट के चलते ही भाती हैं। अनुष्का शर्मा वाली ‘एन एच 10’ इस कतार में सबसे पहले याद आती है। नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी, भूमि पेडनेकर वाली ‘अफवाह’ और तारा सुतारिया वाली ‘अपूर्वा’ भी ऐसी ही कहानियां दिखा रही थीं। ‘स्टोलन’ इन तीनों का मिक्सचर लगती है। ‘एन एच 10’ की तरह इसके किरदार गलत वक्त पर गलत जगह होने के कारण मुसीबतों में फंसते चले जाते हैं। ‘अपूर्वा’ और ‘स्टोलन’ में भौगोलिक स्थितियां एक जैसी हैं और दोनों में अभिषेक बैनर्जी की मौजूदगी इन्हें करीब लाती है। वहीं ‘अफवाह’ की तरह वायरल वीडियो और पीछे पड़े लोगों का हुजूम ‘स्टोलन’ को भी एक डरावनी फिल्म बनाता है। इसे देखते हुए यह सोच कर मन बेचैन होने लगता है कि ऐसे हालात में अपन कभी फंस गए तो…!

Chidiya
Adventure, Drama, Family (Hindi)
सपनों के घोंसले में ख्वाहिशों की ‘चिड़िया’
Fri, May 30 2025
इस फिल्म का नाम, पोस्टर और ट्रेलर देखिए तो लगता है कि यह ऐसे गरीब बच्चों की कहानी होगी जो बैडमिंटन खेलना चाहते हैं लेकिन उनके पास न जगह है, न संसाधन। किसी तरह से ये लोग सब जुगाड़ते हैं, मुश्किलों से लड़ते हैं और एक दिन अपने से बलशाली खिलाड़ियों को हरा कर जीत हासिल करते हैं। लेकिन यह फिल्म देखिए तो ऐसा कुछ नहीं मिलता। बिन बाप के दो बच्चे हैं। ‘चिड़िया’ से खेलना चाहते हैं। किसी तरह से जगह, सामान वगैरह का इंतज़ाम करते हैं लेकिन मां का हाथ बंटाने के लिए उन्हें काम पर जाना पड़ता है। बैडमिंटन खेलने का उनका सपना अंत तक सपना ही बना रहता है। और फिर एक दिन…! यह कहानी असल में उन लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन में झांकती है जो अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पूरी ज़िंदगी निकाल देते है। इस दौरान कभी उनके छोटे-छोटे सपने, छोटी-छोटी ख्वाहिशें सिर उठाती भी हैं तो अक्सर उन्हें दबा दिया जाता है। इस फिल्म को देखिए तो अफसोस होता है कि जिस उम्र में बच्चे पढ़ते हैं, खेलते हैं उस उम्र में कुछ बच्चों को मज़दूरी क्यों करनी पड़ती है? इन बच्चों की बाल-सुलभ हरकतें, जिज्ञासाएं, तमन्नाएं हैं लेकिन मन में टीस उठती है उनकी गरीबी, मजबूरी, बेबसी को देख कर। यह फिल्म हमें ऐसे किरदारों के करीब ले जाकर यह भी दिखाती है कि सपने देखने का हक सिर्फ भरी जेब वालों को ही नहीं होता।

Dilli Dark
Drama (Hindi)
दिल्ली की जुदा सूरत दिखाती ‘दिल्ली डार्क’
Thu, May 29 2025
‘यह अंधेर नगरी है, यहां गलत रास्ता ही मेन रोड है।’ इस फिल्म (Dilli Dark) का एक पगला किरदार दिल्ली के बारे में जब यह बात कहता है तो लगता है कि इस शहर के बारे में इससे ज़्यादा सयानी बात भला और क्या हो सकती है। दिल्ली-नक्शे पर एक शहर लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसी जगह जो जितनी बार उजड़ी, अगली बार उससे ज़्यादा शिद्दत के साथ बसी। एक ऐसी जगह जहां कभी पांडवों ने राज किया तो कभी बाहरी आक्रमणकारी जाते-जाते अपने गुलामों को गद्दी सौंप गए। वही गुलाम वंश जिसमें रज़िया जैसी सुलतान हुई और वही रज़िया जिसने अफ्रीका से आए अपने गुलाम याक़ूत से मोहब्बत की। आज बरसों बाद एक और अफ्रीकी युवक दिल्ली में रह रहा है। माइकल ओकेके (ओके ओके नहीं ओकेके) एक आम लड़का है जिसे हिन्दी समझ में आती है और वह ‘तोड़ा-तोड़ा’ बोल भी लेता है। वह दिल्ली वाला है, दिल्ली वाला बन कर यहीं रहना भी चाहता है। दिन में एम.बी.ए. करता है, लेकिन रात में मजबूरन उसे ड्रग्स बेचनी पड़ती हैं। पंजाबी मकान मालिक की लड़की को देखता है, पड़ोसी बंगाली से दोस्ती करता है, एक धर्मगुरु मानसी उर्फ ‘मां’ के नज़दीक पहुंचता है लेकिन पाता है कि इस शहर में हर कोई बस अपने लिए जीता है।
Latest Reviews


Mardaani 3
Action, Crime, Thriller (Hindi)
Officer Shivani Shivaji Roy returns to hunt down those behind the disappearance of young girls, risking… (more)


Gandhi Talks
Comedy (Hindi)
A silent black comedy, about the monetary needs of a character & how it impacts the… (more)


Valathu Vashathe Kallan
Crime, Thriller, Drama (Malayalam)
A police officer being investigated for his role in a woman’s death rushes to save his… (more)