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Deepak Dua

Independent Film Journalist & Critic

Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.

A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra

All reviews by Deepak Dua

Image of scene from the film Tanvi the Great

Tanvi the Great

Drama (Hindi)

मुश्किलों की चौखट लांघती ‘तन्वी द ग्रेट’

Fri, July 18 2025

तन्वी एक खूबसूरत युवती है। दिल्ली में अपनी मां के साथ रहती है। मीठा गाना गाती है। किस्म-किस्म की जानकारी जुटाना और उसे याद रखना उसकी आदत है। लेकिन वह ‘नॉर्मल’ नहीं है। वह ‘अलग’ है। ‘अलग’ है लेकिन किसी से ‘कमतर’ नहीं है यानी ‘डिफरेंट बट नो लैस’। दरअसल उसे ‘ऑटिज़्म’ है। (‘ऑटिज़्म’ यानी एक ऐसी अवस्था जिसमें इंसान के मस्तिष्क के विकास को नियंत्रित करने वाले धागे कुछ अलग, कुछ कमज़ोर, कुछ उलझे हुए होते हैं जिसके चलते उसका व्यवहार, उसकी आदतें, रूचियां, प्रतिक्रियाएं, सीखने की क्षमता आदि आम लोगों के मुकाबले कुछ अलग होती हैं, कभी कम तो कभी ज़्यादा होती हैं।) तन्वी के फौजी पिता एक हादसे में मारे जा चुके हैं। उसकी मां उसे उसके दादा के पास एक पहाड़ी कस्बे में छोड़ कर विदेश गई है। नई जगह, नए लोग, नया माहौल और तन्वी, जिसे पूरे करने हैं कुछ सपने-कुछ अपने, कुछ अपनों के। लेकिन कैसे? जिस तन्वी को जूतों के फीते तक बांधने में, घर की चौखट तक लांघने में मुश्किल आती है, वह कैसे लांघेगी सपनों के ऊंचे पर्वत…?

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Image of scene from the film Special Ops 2

Special Ops 2

Mystery, Drama, Crime (Hindi)

रोमांच दोगुना मज़ा डबल ‘स्पेशल ऑप्स 2’ में

Fri, July 18 2025

मार्च, 2020 में आए ‘स्पेशल ऑप्स’ (Special Ops) के पहले सीज़न ने अपने प्रति जो दीवानगी हमारे दिलों में जगाई थी उसे नवंबर, 2021 में आई ‘स्पेशल ऑप्स 1.5-द हिम्मत स्टोरी’ ने डेढ़ गुना कर दिया था और तब से इस सीरिज़ के इंतज़ार में दर्शक पलकें बिछाए बैठे हैं। अब जियो हॉटस्टार पर ‘स्पेशल ऑप्स 2’ (Special Ops 2) में जिस तरह से रोमांच का दोहरा जाल बिछाया गया है उसे देखते हुए लगता है कि यह चुनौती नीरज पांडेय, शिवम नायर और उनकी टीम के सामने भी रही होगी कि उन्हें इस बार दर्शकों की उम्मीदों के उस बड़े पहाड़ पर चढ़ना है जिसे खुद उन्होंने ही तैयार किया था। शायद यही कारण है कि इस सीज़न को लाने में इन लोगों ने काफी लंबा वक्त लिया। लेकिन देर आए और बहुत ही दुरुस्त आए वाले स्टाइल में यह सीरिज़ अपने स्तर को बरकरार रखते हुए दर्शकों को रोमांच और आनंद परोस पाने में पूरी तरह से कामयाब रही है। ‘स्पेशल ऑप्स 2’ (Special Ops 2) का ट्रेलर बताता है कि किसी दुश्मन ने भारत के सबसे बड़े ए.आई. वैज्ञानिक को किडनैप कर लिया है। क्या चाहता है वह दुश्मन, इसका जवाब भी ट्रेलर देता है कि उसे भारत के उन सब लोगों के डाटा में घुसना हैं जो अपने मोबाइल पर रोजाना पैसों का लेनदेन करते हैं। कौन है यह दुश्मन और किस के इशारों पर काम कर रहा है? क्या भारतीय खुफिया एजेंसी का सबसे काबिल अफसर हिम्मत सिंह समय रहते उसे रोक पाएगा? यदि हां, तो कैसे, किस तरह…?

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Image of scene from the film Maalik

Maalik

Action, Thriller, Crime, Drama (Hindi)

चरस तो मत बोइए ‘मालिक’

Sat, July 12 2025

1990 के समय का इलाहाबाद। दीपक के मज़दूर पिता को किसी ने खेत समेत रौंद डाला तो उसे मार कर वह पॉवर का भूखा बन बैठा और जल्दी ही इलाके का ‘मालिक’ हो गया। उसकी मर्ज़ी के बगैर अब शहर में कुछ नहीं होता। लेकिन कुछ समय बाद वही लोग उसके खिलाफ हो गए जो कल तक उसके सरपरस्त थे। अब एक तरफ ‘मालिक’ है और दूसरी ओर उसके दुश्मन। हर तरफ से गोलियां बरस रही हैं और पुलिस कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में कूद रही है। अपराधी, नेता और पुलिस की जुगलबंदी का प्लॉट हमारी फिल्मों के लिए कोई नया नहीं है। सच तो यह है कि यह जुगलबंदी हमारे समाज का ही एक ऐसा कड़वा और स्वीकार्य सच है जिसे फिल्म वाले अलग-अलग नज़रिए और अलग-अलग शैली में दिखाते रहते हैं। पर्दे पर ऐसी जुगलबंदियां जब शानदार निकलती हैं तो ‘सत्या’, ‘वास्तव’ हो जाती हैं और अगर बेकार निकलें तो ‘मालिक’ बन जाती हैं। ऐसी तमाम फिल्मों की तरह यह फिल्म भी इस बात को रेखांकित करती है कि ताकत पाने के बाद हर अपराधी सत्ता की कुर्सी चाहता है कि ताकि आज उसके पीछे पड़ी पुलिस कल उसकी बॉडीगार्ड बन जाए।

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Image of scene from the film The Hunt: The Rajiv Gandhi Assassination Case

The Hunt: The Rajiv Gandhi Assassination Case

Crime, Mystery (Hindi)

राजीव गांधी हत्याकांड पर सधी हुई ‘द हंट’

Thu, July 10 2025

21 मई, 1991 की रात तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक महिला ने अपनी कमर में बंधे बम से अपने साथ-साथ वहां चुनाव प्रचार करने के लिए पहुंचे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी मार डाला था। पूरे विश्व को चौंका देने वाली इस घटना के तुरंत बाद भारत सरकार ने एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एस.आई.टी.) बनाई थी जिसने कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए और एक सिरे से दूसरा सिरा जोड़ते हुए 90 दिनों में इस हमले की साज़िश रचने वालों को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। इस पर पत्रकार अनिरुद्ध मित्रा ने एक किताब ‘90 डेज़’ लिखी थी जिस पर निर्देशक नागेश कुकुनूर ने यह वेब-सीरिज़ ‘द हंट-द राजीव गांधी एसेसिनेशन केस’ बनाई है जो सोनी लिव पर रिलीज़ हुई है। एक ऐसी घटना जिसके पल-पल का ब्यौरा दस्तावेजों में, खबरों में मौजूद है, जिसके बारे में सब जानते हैं कि पड़ोसी देश श्रीलंका में अपने लिए अलग क्षेत्र ‘तमिल ईलम’ की मांग कर रहा हिंसावादी संगठन ‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ (लिट्टे) राजीव गांधी से इसलिए खफा था कि उन्होंने वहां भारत से शांति सेना भेज कर उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया था। राजीव गांधी ने ऐलान किया था कि 1991 के चुनाव जीतने के बाद वह फिर श्रीलंका में सेना भेजेंगे। लिट्टे ने इसीलिए उन्हें मारने की योजना बनाई थी जिसमें वे सफल भी हुए। उस घटना के बाद इस साज़िश और तफ्तीश पर ढेरों किताबें लिखी गईं और कुछ एक फिल्में भी बनीं। लेकिन इस वेब-सीरिज़ ने जो दिखाया है वह जैसे इतिहास को जीने जैसा अनुभव देता है।

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Image of scene from the film Metro... in Dino

Metro... in Dino

Drama, Romance, Comedy (Hindi)

मस्त पवन-सी है ‘मैट्रो… इन दिनों’

Fri, July 4 2025

2007 में आई अनुराग बसु की ही फिल्म ‘लाइफ इन ए… मैट्रो’ (Life In A… Metro) की तरह इस फिल्म ‘मैट्रो… इन दिनों’ (Metro… In Dino) में भी कई सारी कहानियां एक साथ चल रही हैं। बोरियत भरी शादीशुदा ज़िंदगी के बीच मोंटी घर से बाहर झांकता है और उसकी पत्नी काजोल उसे नचाती है। काजोल की छोटी बहन चुमकी अपने रिश्ते को लेकर कन्फ्यूज़ है। उसके करीब आया पार्थ तो किसी रिश्ते में ही नहीं पड़ना चाहता। पार्थ के दोस्त श्रुति और आकाश अपनी शादी, बच्चे और कैरियर के संघर्षों में उलझे हुए हैं। उधर काजोल की मां एक बार फिर अपने कॉलेज के दोस्त परिमल के पास जा पहुंची है। साथ ही परिमल की बहू और काजोल की बेटी की अलग-अलग कहानियां भी चल रही हैं। ‘लाइफ इन ए… मैट्रो’ जहां मुंबई शहर के कुछ जोड़ों को दिखा रही थी वहीं इस फिल्म ‘मैट्रो… इन दिनों’ (Metro… In Dino) में अनुराग की कलम ने मुंबई के अलावा दिल्ली, बंगलुरु, पुणे, कोलकाता जैसे शहरों में कहानी का विस्तार किया है जो दर्शाता है कि स्त्री-पुरुष संबंधों की उलझनें और सुलझनें कमोबेश हर जगह एक-सी हैं। अलग-अलग किस्म के किरदारों के ज़रिए वह इस बात को भी उभार पाते हैं कि रिश्तों की पेचीदगियां हर इंसान के खाते में दर्ज होती हैं। फिल्म में एक बात खास तौर पर उभर कर आती है कि रिश्तों में पारदर्शिता और संवादों की कमी से बात बिगड़ती है तो संभालने से संभल भी जाती है, बस कोशिशें जारी रहें।

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Image of scene from the film Kaalidhar Laapata

Kaalidhar Laapata

Comedy, Drama (Hindi)

‘कालीधर’ के साथ मनोरंजन ‘लापता’

Fri, July 4 2025

कालीधर अब कुछ-कुछ भूलने लगा है। उससे छुटकारा पाने के लिए छोटे भाई उसे मेले में छोड़ आते हैं। लेकिन ज़मीन पाने के लिए अब वह उसे तलाश भी रहे हैं। मगर कालीधर वापस नहीं आना चाहता। अब वह के.डी. बन कर आठ बरस के एक नए अनाथ दोस्त बल्लू के साथ मिल कर अपनी अधूरी ख्वाहिशें पूरी कर रहा है। एक दिन वह लौटता है और…! 2019 में आई एक तमिल फिल्म ‘के.डी.’ के इस रीमेक (Kaalidhar Laapata) को उसी फिल्म की डायरेक्टर मधुमिता ने बनाया है। मूल फिल्म में 80 साल का एक बूढ़ा करुप्पू दुरई यानी के.डी. था जो तीन महीने से कोमा में था। एक दिन उसे होश आया और उसने सुन लिया कि उसके परिवार वाले उसे मारने का प्लान बना रहे हैं तो वह घर से भाग गया और एक आठ साल के अनाथ बालक कुट्टी के साथ मिल कर अपनी अधूरी इच्छाएं पूरी करने लगा जिनमें एक ख्वाहिश भर-भर के चिकन बिरयानी खाने की भी थी। तमिल फिल्म की कहानी में तर्क दिखता है। 80 साल का बूढ़ा जो कोमा में पड़ा है, उससे छुटकारा पाने के लिए घरवाले उसकी ज़िंदगी पर फुल स्टॉप लगाने की साज़िश करें तो समझ आता है। लेकिन यहां जवान भाई है, वह भी हट्टा-कट्टा। याद्दाश्त भूलने की शुरुआती सीढ़ी पर खड़े बड़े भाई से छुटकारा पाने की ऐसी क्या जल्दी कि उसे मेले में छोड़ दिया जाए। और मेला भी कौन-सा, कुंभ का। यानी फिल्म बता रही है कि कुंभ में आप अपने घर के बड़ों को छोड़ कर आ सकते हैं। यही नहीं फिल्म यह भी दिखाती है कि कालीधर भोपाल के पास भोजपुर के विश्व प्रसिद्ध शिव मंदिर में सोता है, मंदिर में झाड़ू लगाता है लेकिन खाने के लिए चिकन बिरयानी वाले के पास जाता है। तमिल से हिन्दी में कहानी को कन्वर्ट करते हुए लेखकों के दिमाग की बत्तियां अक्सर ऐसे ही मोड़ों पर आकर फ्यूज़ हो जाती हैं। एक जबरन ठूंसा गया सीन और भी है जो दिखाता है कि भंडारे के लिए आने वाला चावल पंडित जी के घर पर जाता है। कत्तई एजेंडा परोस दो पत्तल पर।

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Image of scene from the film Maa

Maa

Horror (Hindi)

’शैतान’ से ’मां’ की औसत भिड़ंत

Sat, June 28 2025

मार्च, 2024 में आई अजय देवगन, आर. माधवन वाली फिल्म ’शैतान’ में एक अजनबी शख्स एक किशोरी को अपने वश में कर लेता है और उस लड़की का पिता उस शैतान से भिड़ कर अपनी और दूसरी बच्चियों को बचाता है। यह फिल्म ’मां’ भी उसी पटरी पर है। इसमें भी एक शैतान जवान होती बच्चियों को उठा लेता है। पर जब वह काजोल की बेटी को उठाता है तो वह उससे भिड़ जाती है। ज़ाहिर है कि मां की शक्ति के सामने शैतान को हार माननी ही पड़ती है। ‘शैतान’ जहां गुजराती फिल्म ’वश’ का रीमेक थी और उसमें रामगोपाल वर्मा की ’कौन’ का टच था वहीं ’मां’ में काली और रक्तबीज की पौराणिक कहानी, बलि की कुप्रथा, कन्या शिशु हत्या, शापित हवेली के साथ-साथ 2024 में आज ही के दिन यानी 27 जून को रिलीज़ हुई ’कल्कि’ का भी ज़रा-सा टच है। उसमें भी शैतान को अपनी नस्ल बढाने के लिए एक ताकतवर कोख चाहिए और इस फिल्म का शैतान भी वही तलाश रहा है।

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Image of scene from the film Panchayat S04

Panchayat S04

Comedy, Drama (Hindi)

रंगीले परजातंतर की रंग-बिरंगी ‘पंचायत’

Tue, June 24 2025

अमेज़न प्राइम वीडियो की सफल और लोकप्रिय वेब-सीरिज़ ‘पंचायत’ के तीसरे सीज़न में फुलेरा गांव में राजनीतिक सरगर्मियां शुरू हो गई थीं और माहौल बदलने लगा था। प्रधान जी पर गोली चली थी, रिंकी और सचिव जी की नज़दीकियां बढ़ चुकी थीं और भूषण व क्रांति देवी ने प्रधान व मंजू देवी के विरुद्ध कमर कस ली थी। ऐसे में यह तो साफ था कि इस चौथे सीज़न का फोकस राजनीति पर ही रहेगा लेकिन इस फोकस के चलते ‘पंचायत’ अपना मूल स्वाद खो बैठेगी, यह अंदेशा नहीं था। लेकिन ऐसा हुआ है और यही कारण है कि ‘पंचायत’ का यह चौथा सीज़न अच्छा तो लगता है, मगर इसे देखते हुए वह ‘मज़ा’ नहीं आता जिस ‘मज़े’ के लिए यह वेब-सीरिज़ जानी जाती है और जिसके चलते इसने हमारे दिलों पर कब्जा जमाया था। ‘पंचायत’ के पिछले तीनों सीज़न के रिव्यू में मैंने ज़िक्र किया है कि इसे लिखने वाले हर चीज़ को खींचने में लगे हुए हैं जिससे साफ लगता है कि वे लोग कई सारे सीज़न बनाने का लालच अपनी मुट्ठी में लिए बैठे हैं। बावजूद इसके यह सीरिज़ हमें पसंद आती रही है क्योंकि एक तो यह हमें ओ.टी.टी. पर मौजूद अधिकांश कहानियों से परे एक छोटे-से गांव में ले जाती है जहां की मिट्टी में अभी भी सौंधापन बचा हुआ है और दूसरे यह इस उम्मीद को कायम रखती है कि अभी सब कुछ उतना खराब नहीं हुआ है। लेकिन ‘पंचायत’ का चौथा सीज़न देखिए तो लगता है कि इसे बनाने वाले कहानी को जबरन खींच-खींच कर सुस्त रफ्तार से कहानी कहने का कोई विश्व रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं। इस बार के आठों एपिसोड में सिर्फ चुनावों की ही बात है जिससे इसमें एकरसता आई है और कुछ बहुत नया या हट के वाली सामग्री न होने के कारण बोरियत हावी रही है।

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