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Deepak Dua

Independent Film Journalist & Critic

Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.

A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra

All reviews by Deepak Dua

Image of scene from the film O'Romeo

O'Romeo

Crime, Drama, Action (Hindi)

‘ओ रोमियो’ प्यार न करियो…

Sat, February 14 2026

नब्बे के दशक में जब मुंबई अंडरवर्ल्ड पर दाउद की डी कंपनी का राज था तो उसका एक विरोधी था हुसैन उस्तरा। इसी हुसैन उस्तरा ने अशरफ खान नाम की उस औरत को बढ़ावा दिया था जिसके पति को दाउद के कहने पर मारा गया। अपने पति के कत्ल का बदला लेने के लिए अशरफ बन गई थी सपना दीदी और उसने उस्तरा के साथ मिल कर दाउद को शारजाह के स्टेडियम में टपकाने का प्लान भी बना डाला था। लेकिन ऐसा हो न सका और डी कंपनी ने पहले सपना को टपकाया, फिर उस्तरा को। मुंबई अंडरवर्ल्ड को करीब से जानने वाले पत्रकार हुसैन ज़ैदी की किताब ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ के सपना दीदी पर लिखे अध्याय पर आधारित विशाल भारद्वाज की यह फिल्म ‘ओ रोमियो’ (O’ Romeo) सपना और उस्तरा की कहानी को कुछ अलग नज़रिए से देखती है, कुछ अलग ढंग से दिखाती है।

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Image of scene from the film Vadh 2

Vadh 2

Crime, Drama, Thriller (Hindi)

जेल के अंदर ‘वध 2’ का रहस्य

Sat, February 7 2026

किसी निर्दोष को मारना हत्या कहलाता है और किसी अत्याचारी या दुष्ट को मारना वध। लेकिन कानून की नज़र में तो हर हत्यारा दोषी ही होगा न? और किसी को जान से मारा जाए तो वह हत्या होगी या वध यह कौन तय करेगा? 2022 में आई ‘वध’ में एक अधेड़ दंपती ने अपने घर में घुस कर उन्हें परेशान करने वाले दबंग का ‘वध’ किया था। अब ‘वध 2’ (Vadh 2) में मामला घर के अंदर का नहीं, जेल के अंदर का है। मंजू सिंह 28 बरस से जेल में बंद है। अब उसकी रिहाई होने वाली है। जल्द रिटायर होने वाले जेल के एक सिपाही शंभूनाथ मिश्रा के साथ उसका दोस्ताना है। जेल में बंद एक दबंग से हर कोई परेशान है। एक दिन वह गायब हो जाता है। कहां गया वह? क्या उसे मार दिया गया? उसकी लाश कहां गई? मिली या नहीं? मिली तो कहां, कैसे? और यह हत्या थी या वध? किसने मारा उसे? कैसे मारा?

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Image of scene from the film Mardaani 3

Mardaani 3

Action, Crime, Thriller (Hindi)

खूब लड़ी ‘मर्दानी 3’ वो तो फिल्मी रानी थी

Fri, January 30 2026

बुलंदशहर से एक बच्ची किडनैप हुई है। मामला हाई प्रोफाइल है इसलिए आई.पी.एस. शिवानी शिवाजी रॉय को बुलाया जाता है। अपनी तफ्तीश में शिवानी पाती है कि मामला उतना सीधा नहीं है जितना ऊपर से लग रहा है। देश भर से 9-10 साल की बच्चियां गायब हो रही हैं। क्या कारण हो सकता है? उनसे भीख मंगवाई जा रही है? उनके अंग बेचे जा रहे हैं? या फिर कुछ और…? कौन करवा रहा है यह सब? आइए देखते हैं। 2014 में आई प्रदीप सरकार वाली ‘मर्दानी’ से जन्मी सिनेमाई कॉप शिवानी अपनी पैनी नज़र और साहस के लिए सराही गई थी जिसने उस फिल्म में लड़कियों की तस्करी और नशे का कारोबार करने वालों को सबक सिखाया था। बाद में उसी फिल्म के लेखक गोपी पुथरन के निर्देशन में 2019 में ‘मर्दानी 2’ में आकर शिवानी ने एक सनकी बलात्कारी और हत्यारे के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी। इस बार शिवानी के निशाने पर बच्चियों के किडनैपर हैं। मगर क्या इस बार बात पहली दो फिल्मों जैसी मज़बूत बन पाई है? आइए देखते हैं।

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Image of scene from the film The Pact

The Pact

Drama (Hindi)

यादों का हसीन इकरारनामा ‘द पैक्ट’

Sat, January 24 2026

राघव पुणे पहुंचा है उस फ्लैट का सौदा करने जिसमें उसका बचपन बीता था। दीवार पर उसके माता-पिता की तस्वीरें टंगी हैं। यहां उसे वे पल याद आने लगते हैं जो उसने यहां बिताए थे। खासतौर से अपने पिता के साथ अपने रिश्ते और यादों को वह सहेजता है। वह उस पैक्ट यानी इकरारनामे को भी याद करता है जो उसके और उसके पिता के बीच हुआ था। क्या था वह इकरारनामा…? फीचर फिल्मों और वेब-सीरिज़ की भीड़भाड़ में अच्छी शॉर्ट-फिल्में अक्सर छुप जाती हैं। एक वजह तो यही रहती है कि ज़्यादातर शॉर्ट-फिल्में किसी कायदे के प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ ही नहीं हो पातीं हैं। दूसरी वजह यह कि ज़्यादातर दर्शक भी इनके प्रति उदासीन रहते हैं जबकि सच यह है कि यदि अच्छे से बुनी-बनाई कहानी हो तो वह कुछ मिनटों में भी गहरी बात कह जाती है, जैसे यह फिल्म ‘द पैक्ट’ कह रही है।

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Image of scene from the film Border 2

Border 2

Action, Drama, War (Hindi)

मिट्टी के बेटों को सलाम करती ‘बॉर्डर 2’

Sat, January 24 2026

1971 के भारत-पाक युद्ध में इतने सारे मोर्चों पर इतनी सारी लड़ाइयां लड़ी गई थीं कि हमारे फिल्मकार चाहें तो हर साल उन पर फिल्में बना सकते हैं। 13 जून, 1997 को आई जे.पी. दत्ता की ‘बॉर्डर’ उस युद्ध की लोंगेवाला की लड़ाई पर थी तो पिछले दिनों आई श्रीराम राघवन की ‘इक्कीस’ बसंतर की लड़ाई पर। अब आई ‘बॉडर 2’ को बसंतर, शक्करगढ़, मनव्वर तवी, पुंछ, ऑपरेशन चंगेज़, आई.एन.एस. खुखरी जैसे कई मोर्चों को मिला-जुला कर मसालेदार बनाने की कोशिश की गई है। यानी ‘बॉर्डर 2’ पिछली वाली ‘बॉर्डर’ का सीक्वेल नहीं है बल्कि यह उसी नाम वाली एक और फिल्म है जिसमें ‘बॉर्डर’ का फ्लेवर, उसकी खुशबू, उसकी झलक डाली गई है।

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Image of scene from the film Happy Patel: Khatarnak Jasoos

Happy Patel: Khatarnak Jasoos

Comedy, Action, Romance (Hindi)

शोर करता बोर करता ‘हैप्पी पटेल’

Sat, January 17 2026

इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) पर रिसर्च की जानी चाहिए। मैं खुद बहुत उत्सुकता से यह जानना चाहूंगा कि इस फिल्म के लेखकों वीर दास और अमोघ रणदिवे में से किस के दिमाग में इस कहानी का आइडिया पहली बार आया होगा? कैसे उन्होंने उस कहानी पर इस तरह की ऐसी स्क्रिप्ट लिखी होगी? कैसे आमिर खान जैसा निर्माता इस पर दांव लगाने को तैयार हो गया होगा? आखिर क्या दिखा होगा आमिर को उस स्क्रिप्ट में, उस स्क्रिप्ट पर बनी फिल्म में? ऐसा नहीं है कि इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) में कहानी नहीं है। बिल्कुल है और ऐसी है कि यदि उसे सलीके से फैलाया जाए तो उस पर तीन-चार घंटे की फिल्म बन सकती है। लेकिन दिक्कत यही है कि इस फिल्म में से वह ‘सलीका’ ही तो गायब है जो किसी कहानी को रोचक बनाता है। यही कारण है कि सिर्फ दो घंटे की यह फिल्म ज़बर्दस्त शोर से शुरू होकर महाबोर करते हुए शोर में ही खत्म हो जाती है।

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Image of scene from the film Laalo

Laalo

Family, Drama (Gujarati)

आस्था और कर्म का मार्ग दिखलाती ‘लालो’

Sat, January 10 2026

पहले तो यह जान लीजिए कि ‘लालो’ हिन्दी में डब होकर आई एक गुजराती फिल्म है जिसे बिना उपयुक्त प्रचार के रिलीज़ कर दिया गया है, शायद यह सोच कर कि यह अपनी राह खुद बना लेगी। लेकिन इसे बनाने वाले लोग शायद हिन्दी के दर्शकों का मिज़ाज नहीं जानते कि ये लोग सिर्फ उसी चीज़ के पीछे भागते हैं जिसके भीतर भले ही दम हो या न हो लेकिन जिसका ढोल ज़ोर-ज़ोर से बजाया गया हो। तो सुनिए, इस फिल्म ‘लालो-श्रीकृष्ण सदा सहायते’ का ढोल इस तरह से बजाया जा सकता है कि अक्टूबर, 2025 में गुजराती में रिलीज़ हुई यह फिल्म गुजराती सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी हिट फिल्म है। इसके आने से पहले जहां सबसे बड़ी हिट गुजराती फिल्म का कलैक्शन 50 करोड़ था वहीं इस फिल्म का कलैक्शन 120 करोड़ तक जा पहुंचा है। माउथ पब्लिसिटी के दम पर इतनी बड़ी हिट होने के बाद अब यह हिन्दी में डब होकर आई है। ज़ाहिर है इसमें कुछ तो खास होगा ही, आइए देखते हैं।

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Image of scene from the film Ikkis

Ikkis

History, War, Drama (Hindi)

कुछ अलग-सी शौर्य कथा है ‘इक्कीस’

Thu, January 1 2026

1971 में जब भारत पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तान से जूझ रहा था तब पाकिस्तान ने भारत को उलझाने के लिए पश्चिमी सरहद पर भी मोर्चा खोल दिया था। उस दौरान लड़ी गई कई लड़ाइयों में से एक थी ‘बसंतर की लड़ाई’ जिसमें हमारे टैंक सवार वीरों ने पाकिस्तानी टैंकों को नेस्तनाबूद करते हुए असीम शौर्य का प्रदर्शन किया था। उन वीरों में से एक थे सैकिंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल जिन्होंने महज़ 21 साल की उम्र में अद्भुत वीरता दिखाते हुए अपने टैंक में आग लगने के बावजूद पीछे हटने से इंकार करते हुए पाकिस्तानी फौज को भारी नुकसान पहुंचाया था और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। इस सर्वोच्च सम्मान को पाने वाले वह सबसे युवा सैनिक थे। श्रीराम राघवन की यह फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) उसी 21 वर्षीय वीर अरुण खेत्रपाल की कहानी दिखाती है, थोड़े अलग ढंग से।

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