
Deepak Dua
Independent Film Journalist & Critic
Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.
A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra
All reviews by Deepak Dua

Indian 2
Drama, Action, Thriller (Tamil)
‘हिन्दुस्तानी’ वापस जाओ… गो बैक ‘इंडियन’…
Sat, July 13 2024
आदरणीय हिन्दुस्तानी जी, 1996 की मई में जब आप पहली बार सिनेमा के पर्दे पर तमिल में ‘इंडियन’ और हिन्दी में ‘हिन्दुस्तानी’ बन कर आए थे तो हम दर्शकों ने आपका तहेदिल से स्वागत किया था। उस फिल्म में आप नेता जी की सेना में सिपाही थे लेकिन जब आपने आज़ाद भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला देखा तो आप खुद भ्रष्टाचारियों को सज़ा देने में जुट गए। आपके तरीके गैरकानूनी थे लेकिन हम लोग आपके पक्ष में थे क्योंकि आप वह काम कर रहे थे जो दरअसल सरकार को करना चाहिए था। ‘अपरिचित’ तब तक आई नहीं थी और ‘प्रहार’ के मेजर चव्हाण हमें बता गए थे कि सिपाही का काम है लड़ना, लड़ाई के मैदान भले ही बदल जाएं। उस फिल्म के अंत में अपने भ्रष्ट बेटे को मार कर आप हिन्दुस्तान से गायब होकर सिंगापुर चले गए थे। आखिरी सीन में आप हमें उम्मीद दे गए थे कि आप जल्द लौटेंगे और एक बार फिर से भ्रष्टाचारियों का विनाश करेंगे। लेकिन आपने लौटने में 28 बरस लगा दिए, क्यों…?

Chandu Champion
Drama (Hindi)
जिएगा और जीतेगा ‘चंदू चैंपियन’
Fri, June 14 2024
मुरली का बचपन से एक ही सपना था कि ओलंपिक में जाना है, गोल्ड मैडल लेकर आना है। बड़ा होकर वह फौज में गया तो बॉक्सिंग के ज़रिए अपने इस सपने को सच करने में जुट गया। लेकिन 1965 की जंग में उसे इतनी गोलियां लगीं कि वह अपने पैरों से लाचार हो गया। मगर उसने हार नहीं मानी और स्विमिंग करने लगा। 1972 में हुए पैरालंपिक (दिव्यांगजनों के ओलंपिक) में तैराकी में गोल्ड मैडल लेकर आया। यह एक सच्ची कहानी है और ‘चंदू चैंपियन’ (Chandu Champion) इसी कहानी पर बनी है। आप चाहें तो पूछ सकते हैं कि यदि यह सच्ची कहानी है तो इतने बरसों से हमने इसके बारे में कहीं पढ़ा या सुना क्यों नहीं? जवाब वही पुराना है कि हमारे समाज के नायकों और उनकी प्रेरक कहानियों के प्रति हमारे समाज के कर्णधारों का उदासीन रवैया इसका मुख्य कारण है। मुरलीकांत पेटकर भी ऐसे ही एक नायक थे जिन्हें न तो उचित पुरस्कार मिले, न ही सम्मान और वक्त की आंधी ने उन्हें हाशिये पर कर डाला। लेकिन पिछले कुछ सालों में जब सरकार ने ढूंढ-ढूंढ कर ऐसे नायकों को सम्मानित करना शुरू किया तो उनकी कहानी भी सामने आई और 2018 में उन्हें पद्मश्री देकर सम्मानित किया गया। उसके बाद लोगों का ध्यान उन पर गया और नतीजे के तौर पर यह फिल्म बन कर आई है।
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