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Deepak Dua

Independent Film Journalist & Critic

Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.

A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra

All reviews by Deepak Dua

Image of scene from the film Raja Shivaji

Raja Shivaji

Action, History, Drama (Marathi)

कसक छोड़ गई ‘राजा शिवाजी’

Sun, May 3 2026

पहले तो हम-आप इस बात पर हैरान हो सकते हैं कि इस फिल्म के नाम में ‘छत्रपति’ शब्द क्यों नहीं है। शिवाजी महाराज के बारे में हमें (महाराष्ट्र से बाहर वालों को) जितना और जैसा पढ़ाया गया है, उसके मुताबिक वह हमारे लिए ‘छत्रपति शिवाजी’ हैं जिन्होंने कम उम्र में ही तलवार उठा ली और ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की स्थापना करते हुए इतने किले जीते कि उन्हें ‘छत्रपति’ की पदवी दी गई। शिवाजी की शौर्य गाथाएं भले ही हमने अधिक न पढ़ी हों, हम भारतीयों के लिए वह हमारे इतिहास के गौरवशाली नायक थे और हमेशा रहेंगे। फिर उन्हीं शिवाजी राजे की कहानी का नाम यूं सूखा-सा ‘राजा शिवाजी’ (Raja Shivaji) क्यों…?

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Image of scene from the film Ek Din

Ek Din

Romance, Drama (Hindi)

‘एक दिन’ का सदमा

Fri, May 1 2026

ऑफिस के सब लोग घूमने के लिए जापान गए हैं। साथ काम करने वाली मीरा को चुप-चुप के देखने वाला दब्बू दिनेश वहां विश मांगता है कि मीरा उसकी हो जाए, एक दिन के लिए सही। और ऐसा हो भी जाता है। एक हादसे में मीरा को टी.जी.ए. हो जाता है, यानी उसकी याददाश्त चली जाती है, सिर्फ एक दिन के लिए। यह एक दिन मीरा और दिनेश एक साथ बिताते हैं। अगले दिन मीरा की मैमोरी वापस आ जाती है लेकिन वह दिनेश के साथ बिताए इस एक दिन को भूल जाती है। जाहिर है कि दिनेश को सदमा तो लगेगा ही, मगर फिर एक ट्विस्ट आता है…! 1983 में आई कमल हासन-श्रीदेवी वाली फिल्म ‘सदमा’ में याद्दाश्त खो चुकी श्रीदेवी की महीनों तक देखभाल करने वाले कमल को तब गहरा सदमा लगता है जब याद्दाश्त वापस आने के बाद श्रीदेवी उसे पहचानने से इंकार कर देती है। कुछ वही बात इस फिल्म (Ek Din) में भी है, लेकिन कुछ अलग अंदाज में, एक अलग ट्विस्ट के साथ। वह ट्विस्ट ही इस फिल्म में नया है वरना दो घंटे की इस फिल्म का पूरा निचोड़ तो इसके दो मिनट के ट्रेलर में दिख ही चुका है।

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Image of scene from the film Bhooth Bangla

Bhooth Bangla

Horror, Comedy (Hindi)

खोखली ईंटों से बना ‘भूत बंगला’

Fri, April 17 2026

मंगल पुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार में बैठे चार युवकों को एक बाबा कहानी सुना रहा है कि कुछ साल पहले यहां शादियां नहीं हुआ करती थीं क्योंकि वधूसुर नामक राक्षस वधुओं को उठा लेता था। फ्लैश बैक में कहानी दिखने लगती है जिसमें लंदन में रहने वाला (अक्षय कुमार) अपने दादा की वसीयत से मिले महल में मंगलपुर आया है ताकि अपनी बहन की शादी यहां कर सके। इसके लिए वेडिंग प्लानर (परेश रावल), उसके सहयोगी, महल का मैनेजर (असरानी), नौकर-चाकर भी यहां हैं। एक राक्षस भी है, उससे भिड़ने के लिए गुरु जी और उनका चेला है। हीरो की बहन आती है, उसके ससुराल वाले, ज्योतिषी, और भी कई सारे लोग। एक हीरोइन भी बीच-बीच में आती-जाती रहती है। ज़ाहिर है कि इस भीड़भाड़ में कॉमेडी, डर, रोमांच, रोमांस जैसे रस निकलते-बहते रहते हैं।

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Image of scene from the film Matka King

Matka King

Drama, Crime (Hindi)

अपनी छवि चमकाने आया ‘मटका किंग’

Fri, April 17 2026

50 के दशक में मुंबई की कपड़ा मिलों के इलाके में काम करने वाले रतन खत्री ने देखा कि कल्याणजी भगत नाम का एक आदमी न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचैंज में कपास के चढ़ते-गिरते भावों पर लोगों से सट्टा लगवाता है। तब रतन खत्री ने एक नया खेल शुरू किया। जुए के इस खेल को रोचक बनाते हुए वह एक मटके में ताश के पत्ते डाल कर सबके सामने निकालता और जीतने वालों को तुरंत पैसे देता। कुछ ही सालों में उसका यह खेल ‘मटका’ पूरे देश में फैल गया। एक दिन में एक करोड़ रुपए तक का सट्टा लगने लगा और लोग उसे ‘मटका किंग’ तक कहने लगे। बाद में वह फिल्म निर्माण में भी घुसा। 1975 में इमरजैंसी लगी तो उसे जेल में भी डाला गया। वहां से छूट कर उसने फिर यह काम शुरू कर दिया और 90 के दशक तक सक्रिय रहा। 2020 में रतन खत्री की मृत्यु हुई।

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Image of scene from the film Toh Ti Ani Fuji

Toh Ti Ani Fuji

Romance, Drama (Marathi)

सधी, संभली प्रेम कहानी ‘मैं वो और फुजी’

Sat, April 11 2026

फिल्म दिखाती है कि इस पीढ़ी को रिश्ते बनाना और तोड़ना तो आता है, रिश्ते निभाने में ये लोग डगमगा जाते हैं...

जापान के फुजी पर्वत को नखरे वाला पर्वत माना जाता है। कभी यह मीलों दूर से भी दिख जाता है तो कभी पास से भी नज़र नहीं आता है। ज़्यादातर तो यह बादलों में ही छिपा रहता है और कभी अचानक से मन मोहने वाली अदाएं बिखेरने लगता है। हालांकि यह सवा तीन सौ साल पहले आखिरी बार फटा था लेकिन आज भी इसे एक जीवित ज्वालामुखी माना जाता है। इस फिल्म में फुजी का क्या किरदार है, यह आगे समझेंगे लेकिन पहले यह जान लीजिए कि सोनीलिव पर आई यह एक मराठी फिल्म है जिसका मूल नाम ‘तो ती आणि फुजी’ (Toh Ti Ani Fuji) (मैं वो और फुजी Main Woh Aur Fuji) है और यह मराठी के साथ-साथ हिन्दी में भी देखी जा सकती है।

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Image of scene from the film Dhurandhar: The Revenge

Dhurandhar: The Revenge

Action, Crime, Thriller (Hindi)

अब ज़ख्म देने आया ‘धुरंधर’ (2)

Thu, March 19 2026

‘धुरंधर’ दरअसल सवा सात घंटे की फिल्म है जिसका साढ़े तीन घंटे का हिस्सा 5 दिसंबर, 2025 को आया था और अब पौने चार घंटे का यह पार्ट रिलीज़ हुआ है जिसका नाम ‘धुरंधर-द रिवेंज’ (Dhurandhar The Revenge) है। ‘रिवेंज’ यानी बदला। कह सकते हैं कि ‘धुरंधर’ इंटरवल से पहले की फिल्म थी जिसमें भारत का एक एजेंट पाकिस्तान के सिस्टम में घुस रहा था और भारत को दिए जा रहे ज़ख्मों का हिसाब इक्ट्ठा कर रहा था। अब इंटरवल के बाद की इस फिल्म ‘धुरंधर-द रिवेंज’ में वह एजेंट हिसाब चुकता कर रहा है, ज़ख्म दे रहा है। आगे बढ़ने से पहले यह भी साफ हो जाए कि यदि आपने पिछली वाली ‘घुरंघर’ नहीं देखी है तो न तो आपको यह वाली ‘धुरंधर-द रिवेंज’ (Dhurandhar The Revenge) देखनी चाहिए और न ही यह रिव्यू आगे पढ़ना चाहिए। कुछ समझ ही नहीं आएगा तो क्या ही फायदा।

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Image of scene from the film Subedaar

Subedaar

Action, Crime, Drama (Hindi)

फिल्मी ‘सूबेदार’ बड़ा रिस्की

Thu, March 5 2026

‘प्रहार’ में मेजर चव्हाण बने नाना पाटेकर मुंबई में हफ्ता वसूलने और आम आदमियों को आतंकित करने वाले गुंडों को मारने के बाद कोर्ट में कहते हैं-‘आर्मी में हमें सिखाया जाता है देश के लिए लड़ना… अगर लड़ाई के मैदान बदल जाते हैं तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं…?’ इस फिल्म ‘सूबेदार’ (Subedaar) का सूबेदार अर्जुन मौर्य भी यही कर रहा है। पत्नी की असमय मौत के बाद फौज से रिटायर होकर आए अर्जुन की अपनी जवान बेटी श्यामा से नहीं बन रही है। बन तो असल में उसकी किसी से भी नहीं रही है। फौज की ज़िंदगी से अलग अपने शहर के जंगलराज की अव्यवस्थाओं और मनमानियों को वह चुप्पी से झेले जा रहा है। शहर में बालू माफिया बबली दीदी का राज है। बबली का भाई प्रिंस सूबेदार को उकसाता है तो वह भिड़ जाता है। उधर श्यामा अलग ही उलझी पड़ी है।

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Image of scene from the film Kennedy

Kennedy

Crime, Thriller (Hindi)

अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर ‘कैनेडी’

Fri, February 20 2026

‘हम कवि अपनी जवानी की शुरुआत खुशी से करते हैं, लेकिन आखिर में निराशा और पागलपन आ जाता है।’ इंगलिश कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की इन पंक्तियों से शुरू होने वाली अनुराग कश्यप की फिल्म ‘कैनेडी’ बहुत जल्द इन पंक्तियों के अर्थ को बयान करने में लग जाती है। 2020-21 की कोरोना महामारी के समय में स्थित इस फिल्म ‘कैनेडी’ (Kennedy) का केंद्रीय पात्र कैनेडी कभी एक पुलिस वाला उदय शैट्टी हुआ करता था जो शहर के भ्रष्ट पुलिस कमिश्नर की टीम में था। अब भी वह कमिश्नर के कहने पर लोगों को मार रहा है, उनसे उगाही कर रहा है। लेकिन जिस काम को कभी वह खुशी से करता था अब उसी को निराशा और पागलपन से कर रहा है। सिर्फ कुछ रातों की इस कहानी की शुरुआत में ही उदय शैट्टी बता देता है कि पिछले छह सालों में उसने अनगिनत लोगों को मारा है। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए यह फिल्म बीच-बीच में फ्लैश बैक में भी जाती है और तब समझ आता है कि जिस बहुत उलझे हुए कथानक के बीच हम फंसे पड़े हैं, उसके धागे असल में कहां तक फैले हुए हैं।

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