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Deepak Dua

Independent Film Journalist & Critic

Deepak Dua is a Hindi Film Critic honored with the National Award for Best Film Critic. An independent Film Journalist since 1993, who was associated with Hindi Film Monthly Chitralekha and Filmi Kaliyan for a long time. The review of the film Dangal written by him is being taught in the Hindi textbooks of class 8 and review of the film Poorna in class 7 as a chapter in many schools of the country.

A chapter on ‘Film Journalism’ written by him is included in the curriculum of ‘Uttarakhand Open University’. Apart from his regular writing on cinema (and tourism) for many Hindi newspapers, magazines, web-portals in India and abroad, he also appears on various radio and television channels. His film reviews can be found on CineYatra

All reviews by Deepak Dua

Image of scene from the film Happy Patel: Khatarnak Jasoos

Happy Patel: Khatarnak Jasoos

Comedy, Action, Romance (Hindi)

शोर करता बोर करता ‘हैप्पी पटेल’

Sat, January 17 2026

इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) पर रिसर्च की जानी चाहिए। मैं खुद बहुत उत्सुकता से यह जानना चाहूंगा कि इस फिल्म के लेखकों वीर दास और अमोघ रणदिवे में से किस के दिमाग में इस कहानी का आइडिया पहली बार आया होगा? कैसे उन्होंने उस कहानी पर इस तरह की ऐसी स्क्रिप्ट लिखी होगी? कैसे आमिर खान जैसा निर्माता इस पर दांव लगाने को तैयार हो गया होगा? आखिर क्या दिखा होगा आमिर को उस स्क्रिप्ट में, उस स्क्रिप्ट पर बनी फिल्म में? ऐसा नहीं है कि इस फिल्म ‘हैप्पी पटेल-खतरनाक जासूस’ (Happy Patel-Khatarnak Jasoos) में कहानी नहीं है। बिल्कुल है और ऐसी है कि यदि उसे सलीके से फैलाया जाए तो उस पर तीन-चार घंटे की फिल्म बन सकती है। लेकिन दिक्कत यही है कि इस फिल्म में से वह ‘सलीका’ ही तो गायब है जो किसी कहानी को रोचक बनाता है। यही कारण है कि सिर्फ दो घंटे की यह फिल्म ज़बर्दस्त शोर से शुरू होकर महाबोर करते हुए शोर में ही खत्म हो जाती है।

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Image of scene from the film Laalo

Laalo

Family, Drama (Gujarati)

आस्था और कर्म का मार्ग दिखलाती ‘लालो’

Sat, January 10 2026

पहले तो यह जान लीजिए कि ‘लालो’ हिन्दी में डब होकर आई एक गुजराती फिल्म है जिसे बिना उपयुक्त प्रचार के रिलीज़ कर दिया गया है, शायद यह सोच कर कि यह अपनी राह खुद बना लेगी। लेकिन इसे बनाने वाले लोग शायद हिन्दी के दर्शकों का मिज़ाज नहीं जानते कि ये लोग सिर्फ उसी चीज़ के पीछे भागते हैं जिसके भीतर भले ही दम हो या न हो लेकिन जिसका ढोल ज़ोर-ज़ोर से बजाया गया हो। तो सुनिए, इस फिल्म ‘लालो-श्रीकृष्ण सदा सहायते’ का ढोल इस तरह से बजाया जा सकता है कि अक्टूबर, 2025 में गुजराती में रिलीज़ हुई यह फिल्म गुजराती सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी हिट फिल्म है। इसके आने से पहले जहां सबसे बड़ी हिट गुजराती फिल्म का कलैक्शन 50 करोड़ था वहीं इस फिल्म का कलैक्शन 120 करोड़ तक जा पहुंचा है। माउथ पब्लिसिटी के दम पर इतनी बड़ी हिट होने के बाद अब यह हिन्दी में डब होकर आई है। ज़ाहिर है इसमें कुछ तो खास होगा ही, आइए देखते हैं।

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Image of scene from the film Ikkis

Ikkis

History, War, Drama (Hindi)

कुछ अलग-सी शौर्य कथा है ‘इक्कीस’

Thu, January 1 2026

1971 में जब भारत पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तान से जूझ रहा था तब पाकिस्तान ने भारत को उलझाने के लिए पश्चिमी सरहद पर भी मोर्चा खोल दिया था। उस दौरान लड़ी गई कई लड़ाइयों में से एक थी ‘बसंतर की लड़ाई’ जिसमें हमारे टैंक सवार वीरों ने पाकिस्तानी टैंकों को नेस्तनाबूद करते हुए असीम शौर्य का प्रदर्शन किया था। उन वीरों में से एक थे सैकिंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल जिन्होंने महज़ 21 साल की उम्र में अद्भुत वीरता दिखाते हुए अपने टैंक में आग लगने के बावजूद पीछे हटने से इंकार करते हुए पाकिस्तानी फौज को भारी नुकसान पहुंचाया था और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। इस सर्वोच्च सम्मान को पाने वाले वह सबसे युवा सैनिक थे। श्रीराम राघवन की यह फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) उसी 21 वर्षीय वीर अरुण खेत्रपाल की कहानी दिखाती है, थोड़े अलग ढंग से।

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Image of scene from the film Tu Meri Main Tera Main Tera Tu Meri

Tu Meri Main Tera Main Tera Tu Meri

Romance, Comedy (Hindi)

‘तू मेरी’ खिचड़ी ‘मैं तेरा’ दलिया

Thu, December 25 2025

इस रिव्यू का हैडिंग पढ़ कर यदि आप सोच रहे हों कि यह फिल्म खिचड़ी या दलिए की तरह पौष्टिक होगी और तो ज़रा रुकिए… पहले इस फिल्म ‘तू मेरी मैं तेरा मैं तेरा तू मेरी’ (TMMTMTTM) का पूरा रिव्यू पढ़ लीजिए, फिर फैसला कीजिएगा। अमेरिका में बस चुका एक बेहद अमीर लड़का दिल्ली से सीधे क्रोएशिया जा रहा है-घूमने, अकेले। न बिक पा रही किताबें लिख कर (पता नहीं कैसे) अमीर बन चुकी लड़की भी वहीं जा रही है-घूमने अकेले। अब किसी टूर पर दो अकेले मिलेंगे तो दुकेले हो ही जाएंगे न! तो बस, यहां भी वही हुआ। पहले रार, तकरार, फिर बिस्तर वाला और बाद में सच्चा प्यार। लेकिन बीच में आ गई मां-बाप की दीवार। दरअसल लड़के की मां को अमेरिका में रहना पसंद है और लड़की के बाप को आगरा में। अब लड़का जा पहुंचा है आगरा में अपनी सिमरन के बाऊ जी को पटाने। क्योंकि वह सिमरन ही क्या जो बाऊ जी की मर्ज़ी के बिना शादी कर ले और वह बाऊ जी ही क्या जो अंत में यह न कह दें-जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी। दुर्र फिट्टे मुंह!

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Image of scene from the film Kis Kisko Pyaar Karoon 2

Kis Kisko Pyaar Karoon 2

Comedy, Romance, Drama (Hindi)

इस सर्कस में है टाइमपास कॉमेडी

Sat, December 13 2025

10 साल से ऊपर हो गए जब कॉमेडी के लिए चर्चित कपिल शर्मा बतौर हीरो अपनी पहली फिल्म ‘किस किस को प्यार करूं’ लेकर आए थे। उस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे युवक की भूमिका निभाई थी जिसे मजबूरी में तीन शादियां करनी पड़ती हैं और अब वह अपनी पसंद की लड़की से चौथा ब्याह रचाने जा रहा है। उस फिल्म में रोमांस की हल्की खुशबू के साथ कॉमेडी का तड़का था और दर्शकों ने उस फिल्म पर अपनी पसंदगी का ठप्पा भी लगाया था। यह फिल्म ‘किस किस को प्यार करूं 2’ उसी कड़ी की अगली फिल्म है। लेकिन यह उसका सीक्वेल नहीं है बल्कि लगभग उसी कहानी पर फिर से बनाई गई फिल्म है-कुछ अलग तड़के के साथ

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Image of scene from the film Dhurandhar

Dhurandhar

Action, Thriller (Hindi)

ज़ख्मों का हिसाब लेने आया ‘धुरंधर’

Sat, December 6 2025

इस फिल्म ‘धुरंधर’ (Dhurandhar) का ट्रेलर देखिए तो पता चलता है कि एक युवक (जो भारतीय एजेंट हो सकता है), पाकिस्तान के लयारी टाऊन में पहुंचता है जिसके बाद बेहिसाब खून-खराबा शुरू हो जाता है क्योंकि भारत के खुफिया ब्यूरो के एक बड़े अफसर का कहना है-मुंह तोड़ने के लिए मुठ्ठी बंद करना ज़रूरी है। पर क्या आपने इससे पहले कभी लयारी के बारे में सुना था…? दरअसल पाकिस्तान की व्यावसायिक राजधानी कहे जाने वाले कराची शहर का एक बहुत पुराना और ऐतिहासिक इलाका है लयारी। इस इलाके की अहमियत इतनी है कि इसे ‘कराची की मां’ तक कहा जाता है। ऐसा इलाका जहां पख्तून, बलूच, सरायकी, सिंधी, कच्छी, मुहाजिर जैसी कई सारी कौमें मिल-ठन कर रहती हैं। कोई वक्त था जब यहां बलूचों और पख्तूनों (पठानों) में हमेशा तलवारें खिंची रहती थीं। दोनों के अपने-अपने गैंग थे जो अक्सर आपस में भिड़ते रहते थे। दोनों की सरपरस्त अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियां थीं। बलूच गैंग के सरदार रहमान डकैत (जी हां, यही नाम था उसका) के सिर पर पाकिस्तान की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी का हाथ था जिसके लिए रहमान लयारी में वोटों का इंतज़ाम करता था और बदले में अपने काले धंधे चलाता था। फिर एक वक्त आया जब खुद पाकिस्तान के राष्ट्रपति (जी हां, सही पढ़ा आपने, खुद वहां के राष्ट्रपति) ने रहमान डकैत को आशीर्वाद देकर उसकी एक अलग पॉलिटिकल पार्टी बनवा दी। धीरे-धीरे इन गैंग्स्टर लोगों का आतंक वहां इतना ज़्यादा बढ़ गया कि पहले 2012 और फिर 2013 में पाकिस्तानी सरकार ने इनके खिलाफ जंग छेड़ दी जिसे ‘ऑपरेशन लयारी’ कहा गया। यह फिल्म ‘धुरंधर’ (Dhurandhar) उसी ऑपरेशन के पीछे की कहानी दिखाती है, आगे की कहानी इस फिल्म के अगले पार्ट में दिखाई जाएगी जो मार्च, 2026 में रिलीज़ होगा।

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Image of scene from the film Tere Ishk Mein

Tere Ishk Mein

Romance, Drama, Action (Hindi)

रांझणा बनने चला ‘तेरे इश्क में’

Sat, November 29 2025

लड़की हाथ छुड़ा कर मुड़ी तो उसकी चूड़ी का कांच टूट कर लड़के को ज़ख्म दे गया। ऐसा ज़ख्म कि उसने शहर को फूंकना चाहा। लड़की किसी और से शादी करने चली तो वह उसे श्रॉप दे आया कि शंकर करे तुझे बेटा हो, तुझे भी पता चले कि इश्क में जो मर जाते हैं वो भी किसी के बेटे होते हैं। कहानी की यह झलक बताती है कि यह फिल्म हमें इश्क-मोहब्बत के उन दर्द भरे रास्तों पर ले जाने आई है जिसे देख कर आशिकों के दिल तड़पते हैं और जिन्होंने कभी प्यार न किया हो वे सुकून महसूस करते हैं। फिल्मकार आनंद एल. राय की ‘रांझणा’ भी तो ऐसी ही फिल्म थी जिसमें मुरारी ने कुंदन से कहा था-मर जाओ पंडित। पंडित उस फिल्म में इश्क करते हुए मरा तो इस फिल्म में भी वही रूप धर कर आ गया। वैसे भी सभी दिलजले, बर्बाद आशिकों की सूरत एक जैसी ही हो जाती है।

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Image of scene from the film Gustaakh Ishq

Gustaakh Ishq

Romance, Drama (Hindi)

जाड़ों की नर्म धूप-सा

Fri, November 28 2025

1998 का वक्त। पुरानी दिल्ली में बंद होने के कगार पर खड़ी अपनी प्रिंटिंग प्रैस को बचाने के लिए नवाबुद्दीन रिज़वी जा पहुंचा है पंजाब के मलेरकोटला में शायर अज़ीज़ बेग के पास। सुना है किसी ज़माने में अज़ीज़ मियां मुशायरे लूट लिया करते थे। लेकिन एक ज़ख्म मिला और उन्होंने लिखना ही छोड़ दिया। उनके कलाम भी कभी छप न सके, या कहें कि उन्होंने छपवाए ही नहीं। नवाब चाहता है कि अज़ीज़ साहब उसे अपनी शायरी दे दें। सीधे नहीं कह सकता, सो उनकी शागिर्दी में शायरी सीखने लगता है। लेकिन अज़ीज़ बेग का कहना है कि वो फनकार ही क्या जिसे अव्वल कहलाने के लिए खुद पर बाज़ार की मुहर लगवानी पड़े। इधर अज़ीज़ साहब की शागिर्दी करते हुए उनकी बेटी मन्नत और नवाब का इश्क परवान चढ़ रहा है तो उधर दिल्ली में तंगहाल मुंह बाए खड़ी है। क्या बच पाएगी नवाब की प्रिंटिंग प्रेस? क्या अज़ीज़ बेग अपने कलाम छपवाने पर राज़ी हो जाएंगे? आखिर लिखना क्यों छोड़ा था उन्होंने? क्या नवाब का झूठ पकड़ा जाएगा? मन्नत और नवाब का इश्क मुकम्मल होगा या…!

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